बृहस्पति वार व्रत कथा
**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में व्रतों का विशेष महत्व है, जो न केवल शारीरिक शुद्धि प्रदान करते हैं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। इन्हीं पावन व्रतों में से एक है बृहस्पति वार का व्रत, जो देव गुरु बृहस्पति को समर्पित है। जिस प्रकार सत्यनारायण भगवान की कथा और पूजा सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है, ठीक उसी प्रकार बृहस्पति देव का यह व्रत जीवन में ज्ञान, धन, संतान और वैवाहिक सुख की प्राप्ति का अनुपम साधन माना जाता है। गुरुवार, सप्ताह का वह पवित्र दिन है जब जगत के गुरु बृहस्पति अपनी कृपा दृष्टि बरसाते हैं। यह व्रत गुरु ग्रह के अशुभ प्रभावों को शांत करने और शुभ फलों को बढ़ाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से किए गए इस व्रत से साधक के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों के लिए फलदायी है जो शिक्षा, संतान सुख या वैवाहिक जीवन में harmony की कामना करते हैं। यह गुरु की कृपा का अनुभव करने का एक दिव्य माध्यम है, जो जीवन के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश से भर देता है। इस पावन व्रत का महत्व वेदों और पुराणों में भी वर्णित है, जो इसके अलौकिक प्रभाव को सिद्ध करता है। यह व्रत हमें संयम, भक्ति और विश्वास की शक्ति का अनुभव कराता है, जिससे हमारा चित्त शांत होता है और हम जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक सकारात्मकता के साथ कर पाते हैं। इसका प्रभाव इतना गहरा है कि यह पीढ़ियों तक सद्गुणों और आशीर्वादों को संचारित करता है।
**पावन कथा**
प्राचीन काल की बात है, एक अत्यंत धर्मात्मा और दानी राजा राज्य करता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, प्रजा सुखी थी, परंतु उसे एक दुख था – उसके कोई संतान नहीं थी। राजा और रानी, दोनों ही इस बात से अत्यंत चिंतित रहते थे और अनेक तीर्थों का भ्रमण कर चुके थे, अनेक दान-पुण्य कर चुके थे, किंतु उनकी मनोकामना पूर्ण नहीं हो रही थी। उनकी राजसी संपदा, वैभवशाली जीवन और प्रजा का प्रेम भी इस रिक्तता को भर नहीं पा रहा था। वे हर पल एक पुत्र की कामना में डूबे रहते थे, जिसके बिना उनका जीवन अधूरा सा लगता था।
एक दिन, राजा शिकार पर गए थे। वे जंगल में बहुत दूर निकल गए और भटक गए। तभी उन्हें एक वृद्ध महात्मा मिले, जो अत्यंत तेजस्वी और ज्ञानवान प्रतीत हो रहे थे। महात्मा का मुखमंडल दिव्य आभा से युक्त था और उनके नेत्रों में गहन तपस्या का तेज विद्यमान था। राजा ने महात्मा को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने अपनी संतानहीनता का दुख विस्तार से बताया और निवेदन किया कि क्या कोई ऐसा मार्ग है, जिससे उनकी यह पीड़ा दूर हो सके। महात्मा ने राजा की बात ध्यान से सुनी, उनके दुख को समझा और कहा, “हे राजन, आप देव गुरु बृहस्पति की कृपा से वंचित हैं। आपको बृहस्पति वार का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी और आपके कुल को एक तेजस्वी वारिस प्राप्त होगा।”
राजा ने महात्मा से व्रत की विधि पूछी। महात्मा ने बताया, “गुरुवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और देव गुरु बृहस्पति का हृदय से ध्यान करें। पूजा में चने की दाल, हल्दी, केले और गुड़ का भोग लगाएँ। श्रद्धापूर्वक बृहस्पति वार व्रत कथा सुनें और सुनाएँ। दिन भर फलाहार करें और केवल एक बार पीले रंग का भोजन ग्रहण करें, जिसमें नमक का बिल्कुल भी प्रयोग न हो। यह व्रत निष्ठापूर्वक करने से गुरुदेव अवश्य प्रसन्न होंगे और आपको अभीष्ट फल प्रदान करेंगे।” राजा ने महात्मा का आभार व्यक्त किया और महल लौटकर रानी को सारी बात बताई। रानी भी संतान सुख की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर राजा के साथ व्रत करने को तैयार हो गईं। उनके मन में एक नई आशा और उत्साह का संचार हुआ।
राजा और रानी ने अगले गुरुवार से ही व्रत का संकल्प लिया। उन्होंने पूरी श्रद्धा और नियम से व्रत का पालन करना शुरू किया। वे हर गुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर, स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर, विधि-विधान से पूजा करते। वे पास के एक केले के वृक्ष की भी पूजा करते, उस पर जल चढ़ाते और चने की दाल व गुड़ का भोग लगाकर कथा सुनते। उनकी यह भक्ति दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। इस व्रत को करते-करते उन्हें कई महीने बीत गए, लेकिन उनकी निष्ठा में जरा भी कमी नहीं आई। उनकी निरंतर भक्ति और अटूट विश्वास से प्रसन्न होकर एक दिन देव गुरु बृहस्पति स्वयं एक सामान्य ब्राह्मण का वेश धारण कर उनके महल में आए। ब्राह्मण के मुख पर अद्भुत तेज था, जिसे देखकर राजा और रानी ने उन्हें आदरपूर्वक आसन दिया और उनसे उनका आगमन प्रयोजन पूछा। ब्राह्मण ने अत्यंत मधुर वाणी में कहा, “हे राजन, मैं आप दोनों की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं जानता हूँ कि आप संतान प्राप्ति की कामना से बृहस्पति वार का व्रत कर रहे हैं। आपकी निष्ठा और धैर्य ने मुझे यहाँ खींच लाया है।”
राजा और रानी, ब्राह्मण के मुख से ऐसी अलौकिक बातें सुनकर आश्चर्यचकित रह गए और समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं देव गुरु बृहस्पति हैं। उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और अपनी भक्ति के लिए क्षमा याचना की कि वे उन्हें पहचान नहीं पाए। गुरुदेव ने उन्हें स्नेहपूर्वक उठाया और आशीर्वाद देते हुए कहा, “हे राजन, तुम्हारी निष्ठा और धैर्य ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि शीघ्र ही तुम्हारे घर में एक तेजस्वी और धर्मात्मा पुत्र का जन्म होगा, जो तुम्हारे कुल का नाम रोशन करेगा और तुम्हारे राज्य को समृद्धि से भर देगा।” इतना कहकर देव गुरु अंतर्ध्यान हो गए।
गुरुदेव के आशीर्वाद के कुछ ही समय पश्चात, रानी गर्भवती हुईं और नौ महीने बाद उन्होंने एक सुंदर, स्वस्थ और अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा और रानी की खुशी का ठिकाना न रहा। पूरे राज्य में आनंद की लहर दौड़ गई। उन्होंने अपने पुत्र का नाम ‘बृहस्पति’ रखा और पूरे राज्य में धूमधाम से उसका जन्मोत्सव मनाया। उन्होंने गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन का दान किया। उसके बाद से राजा और रानी आजीवन बृहस्पति वार का व्रत श्रद्धापूर्वक करते रहे और उनका राज्य सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहा। उनके पुत्र ने भी बड़ा होकर अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण शासक का कार्यभार संभाला। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि बृहस्पति वार का व्रत सच्ची निष्ठा और विधिपूर्वक करने से गुरुदेव अवश्य ही अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं, उन्हें सुख, समृद्धि, ज्ञान और संतान सुख का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह व्रत धैर्य, विश्वास और भक्ति का प्रतीक है, जो जीवन को आलोकित करता है और अंधकार को मिटाकर प्रकाश भर देता है।
**दोहा**
बृहस्पति देव दीनदयाल, हरें सकल संकट जंजाल।
गुरु चरण कमल धर ध्यान, मिले ज्ञान धन सुखद मान।।
**चौपाई**
जयति जयति गुरुदेव महान, वेद पुराण बखानें ज्ञान।
पीत वस्त्रधारी मनोहारी, सब जग के पालनहारी।।
करें कृपा जो जन मन लाए, बुद्धि बल वैभव सब पाए।
जो नर नारी व्रत शुभ करहीं, सकल मनोरथ पूर्ण करहीं।।
**पाठ करने की विधि**
बृहस्पति वार व्रत का पालन अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से करना चाहिए। इसके विधि-विधान का पालन करने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
1. **सुबह का संकल्प**: गुरुवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्य उदय से पूर्व) उठें। अपने नित्यकर्मों से निवृत्त होकर, शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। मन में देव गुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए पूरी निष्ठा के साथ व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय अपनी मनोकामना का भी स्मरण करें।
2. **पूजा की तैयारी**: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक साफ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ। उस पर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि प्रतिमा उपलब्ध न हो तो केले के पेड़ की भी पूजा की जा सकती है, उसे ही गुरुदेव का स्वरूप मानकर। केले का पेड़ न होने पर एक केले के पत्ते को चौकी पर रखकर उसकी पूजा करें।
3. **पूजा सामग्री**: पूजा में पीले रंग की वस्तुएँ विशेष रूप से प्रयोग की जाती हैं। इसमें चने की दाल, गुड़, हल्दी पाउडर या हल्दी की गांठ, पीले फूल (गेंदा), केले, बेसन के लड्डू या कोई अन्य पीली मिठाई, धुप, दीप, गंगाजल, कुमकुम, अक्षत (पीले रंगे हुए चावल) और एक लोटा जल शामिल हैं।
4. **पूजा विधान**: सबसे पहले गणेश जी का आह्वान करें, क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं। फिर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का ध्यान करते हुए उन्हें जल, फूल, अक्षत, हल्दी, चंदन, कुमकुम आदि अर्पित करें। चने की दाल और गुड़ का भोग लगाएँ। केले और अन्य पीली मिठाई भी श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। एक दीपक जलाएँ और धूप-अगरबत्ती दिखाएँ।
5. **कथा श्रवण/पाठ**: आरती करने से पहले बृहस्पति वार व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें या किसी अन्य व्यक्ति से सुनें। कथा सुनने के बाद भगवान की कपूर या रुई की बाती से बनी आरती करें। आरती करते समय “ओम जय जगदीश हरे” या “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
6. **प्रसाद वितरण**: आरती के बाद, भगवान को अर्पित किया गया प्रसाद परिवार के सदस्यों में और अन्य भक्तों में वितरित करें। संभव हो तो ब्राह्मणों, गरीबों या मंदिरों में भी प्रसाद और पीली वस्तुओं (जैसे चने की दाल, केला, गुड़, हल्दी) का दान करें। प्रसाद ग्रहण करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
7. **भोजन**: दिनभर फलाहार करें। शाम को पूजा संपन्न होने के बाद, केवल एक बार बिना नमक का पीला भोजन ग्रहण कर सकते हैं, जैसे बेसन का चीला, पीली दाल-चावल, या बेसन की सब्जी। इस दिन नमक का सेवन पूर्णतः वर्जित माना जाता है। जल का सेवन आवश्यकतानुसार कर सकते हैं।
**पाठ के लाभ**
बृहस्पति वार व्रत के विधि-विधान पूर्वक पालन से साधक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं, जो उसके लौकिक और पारलौकिक जीवन को सुखमय बनाते हैं। यह व्रत आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ भौतिक सफलताओं का भी मार्ग प्रशस्त करता है।
1. **ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति**: देव गुरु बृहस्पति ज्ञान और विद्या के अधिष्ठाता हैं। इस व्रत को करने से शिक्षा में उन्नति होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और बुद्धि तीव्र होती है। विद्यार्थियों के लिए यह व्रत विशेष रूप से फलदायी है, क्योंकि यह एकाग्रता और अकादमिक सफलता प्रदान करता है।
2. **संतान सुख**: जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में बाधाएँ आ रही हों, उन्हें यह व्रत अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। गुरुदेव की कृपा से तेजस्वी, गुणवान और संस्कारी संतान की प्राप्ति होती है, जो कुल का नाम रोशन करती है।
3. **वैवाहिक सुख**: विवाह में विलंब या वैवाहिक जीवन में harmony की कमी वाले जातकों को यह व्रत करने से शीघ्र शुभ विवाह के योग बनते हैं और दांपत्य जीवन में मधुरता, प्रेम और आपसी समझ बढ़ती है। यह जीवनसाथी के साथ संबंधों को मजबूत करता है।
4. **धन और समृद्धि**: गुरु ग्रह धन और ऐश्वर्य का कारक है। इस व्रत को करने से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है, व्यापार में वृद्धि होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह दरिद्रता का नाश करता है और व्यक्ति को कर्जमुक्त होने में सहायता करता है।
5. **रोगों से मुक्ति**: यह व्रत शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने में भी सहायक है। गुरु की कृपा से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। यह शरीर को ऊर्जावान और मन को शांत रखता है।
6. **गुरु ग्रह की शांति**: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो या अशुभ स्थिति में हो, तो यह व्रत गुरु के नकारात्मक प्रभावों को शांत कर शुभ फल प्रदान करता है, जिससे जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
7. **मान-सम्मान में वृद्धि**: गुरु बृहस्पति के आशीर्वाद से व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उसके विचारों और कार्यों को सराहना मिलती है।
8. **मानसिक शांति**: व्रत के दौरान की गई भक्ति और ध्यान से मन को असीम शांति मिलती है, चिंताएँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह आध्यात्मिक चेतना को भी जागृत करता है।
यह व्रत केवल सांसारिक लाभ ही नहीं देता, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी खोलता है, जिससे जीवन में संतोष, संतुष्टि और परम सुख की अनुभूति होती है। यह जीवन को एक नई दिशा और उद्देश्य प्रदान करता है।
**नियम और सावधानियाँ**
बृहस्पति वार व्रत का पालन करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और कोई त्रुटि न हो।
1. **पूर्ण स्वच्छता**: व्रत वाले दिन पूर्ण स्वच्छता का ध्यान रखें। घर और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और स्वच्छ रखें। स्वयं भी स्नान के उपरांत स्वच्छ, धुले हुए और पीले वस्त्र ही धारण करें। अस्वच्छता से व्रत खंडित हो सकता है।
2. **भोजन संबंधी नियम**: इस दिन नमक का सेवन पूर्णतः वर्जित है। केवल एक समय बिना नमक का पीला भोजन जैसे बेसन का चीला, पीली दाल-चावल, या फल आदि ग्रहण करें। मांस-मदिरा और प्याज-लहसुन का सेवन कदापि न करें, क्योंकि ये तामसिक भोजन हैं।
3. **केले का सेवन**: व्रत वाले दिन स्वयं केले का सेवन नहीं करना चाहिए। केले का दान करना शुभ माना जाता है, पर स्वयं व्रतधारी को नहीं खाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि केले के वृक्ष में देव गुरु बृहस्पति का वास होता है, इसलिए उनका सेवन वर्जित है।
4. **केश और नाखून**: इस दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए, दाढ़ी नहीं बनवानी चाहिए और नाखून भी नहीं काटने चाहिए। यह शुभ नहीं माना जाता।
5. **सात्विक विचार**: व्रत के दिन मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध या नकारात्मक विचार न लाएँ। सात्विक और भक्तिपूर्ण विचारों का ही चिंतन करें। किसी की निंदा न करें और झूठ न बोलें।
6. **पीली वस्तुओं का दान**: व्रत के दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, गुड़, हल्दी, केले आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे गुरुदेव प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
7. **जल का अर्पण**: यदि संभव हो तो केले के वृक्ष को जल अवश्य अर्पित करें। यह गुरुदेव के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है।
8. **मासिक धर्म में सावधानी**: स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान व्रत करने से बचना चाहिए या केवल मानसिक पूजा करनी चाहिए। शारीरिक रूप से पूजा-पाठ, स्पर्श आदि नहीं करना चाहिए। इस अवधि में कथा सुन सकती हैं, लेकिन पूजा सामग्री को न छूएँ।
9. **अतिथियों का सत्कार**: यदि कोई अतिथि घर आए तो उसका आदर सत्कार करें और यथासंभव उसे भी प्रसाद दें। अतिथि को भगवान का रूप माना जाता है।
10. **गुरुजनों का सम्मान**: अपने गुरुजनों, माता-पिता और बुजुर्गों का आदर करें, उनका आशीर्वाद लें, क्योंकि बृहस्पति देव गुरुओं के भी गुरु हैं। उनका अपमान करने से गुरु दोष लग सकता है।
इन नियमों का ईमानदारी से पालन करने से बृहस्पति देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और व्रत का पूर्ण तथा श्रेष्ठ फल मिलता है, जिससे जीवन सुखमय और समृद्ध बनता है।
**निष्कर्ष**
बृहस्पति वार का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु यह जीवन में ज्ञान, सद्बुद्धि, सुख-समृद्धि और शांति लाने का एक दिव्य माध्यम है। यह हमें सिखाता है कि धैर्य, निष्ठा और अटूट विश्वास से किया गया कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। देव गुरु बृहस्पति अपनी असीम कृपा से भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं और उनके जीवन को खुशियों से भर देते हैं। जिस प्रकार सत्यनारायण भगवान की कथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है और मनोकामनाएँ पूर्ण करती है, उसी प्रकार बृहस्पति देव का यह व्रत हमें जीवन में सही दिशा दिखाता है और हमारे आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होता है। यह हमें अपने आंतरिक गुरु से जुड़ने और आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। तो आइए, हम सभी इस पावन व्रत को सच्चे मन से अपनाएँ, गुरुदेव की शरण में जाएँ और उनके दिव्य आशीर्वाद से अपने जीवन को आलोकित करें। यह व्रत केवल बाहरी सुखों की प्राप्ति का मार्ग नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक संतोष का भी एक सशक्त साधन है। बृहस्पति देव की जय! हर गुरुवार को यह व्रत आपको एक नई ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देगा, आपके जीवन को धन्य बनाएगा।

