बृहस्पतिवार व्रत कथा सनातन धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कल्याणकारी व्रत है, जो भगवान बृहस्पति देव और भगवान विष्णु को समर्पित है। यह व्रत सुख-समृद्धि, ज्ञान, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है। यह ब्लॉग आपको इस पावन व्रत की महिमा, इसकी पौराणिक कथा, पाठ करने की विधि और इसके अद्भुत लाभों से अवगत कराएगा।

बृहस्पतिवार व्रत कथा सनातन धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कल्याणकारी व्रत है, जो भगवान बृहस्पति देव और भगवान विष्णु को समर्पित है। यह व्रत सुख-समृद्धि, ज्ञान, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है। यह ब्लॉग आपको इस पावन व्रत की महिमा, इसकी पौराणिक कथा, पाठ करने की विधि और इसके अद्भुत लाभों से अवगत कराएगा।

बृहस्पतिवार व्रत कथा

प्रस्तावना
सनातन धर्म में अनेकानेक व्रत और त्यौहार मनाए जाते हैं, जो मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और लौकिक सुख प्रदान करते हैं। इन्हीं पावन व्रतों में से एक है बृहस्पतिवार व्रत। यह व्रत भगवान बृहस्पति देव को समर्पित है, जिन्हें देवताओं का गुरु और ज्ञान, विवेक तथा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की भी विशेष पूजा की जाती है, क्योंकि बृहस्पति देव स्वयं भगवान विष्णु के ही अंश माने जाते हैं। गुरुवार का दिन पीला रंग, चने की दाल और केले के वृक्ष से जुड़ा है, जो इस व्रत की विशिष्ट पहचान है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि, शांति, संतान प्राप्ति, सुखी दांपत्य जीवन और मनोकामनाओं की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। आइए, इस पावन व्रत की अद्भुत कथा, इसकी विधि और महत्व को विस्तार से जानते हैं, जो आपके जीवन को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करेगा।

पावन कथा
प्राचीन काल में एक विशाल राज्य में एक अत्यंत धर्मात्मा और प्रजापालक राजा राज करते थे। उनके राज्य में सब सुखी थे, परंतु राजा की पत्नी, महारानी, स्वभाव से अत्यंत अभिमानी और दान-पुण्य से विमुख थीं। वे धन-संपत्ति पर गर्व करती थीं और गरीबों तथा संतों का अनादर करती थीं। उनके इस व्यवहार से राजा चिंतित रहते थे, पर वे कुछ कह नहीं पाते थे।

एक दिन, भगवान बृहस्पति देव ने महारानी को सही मार्ग दिखाने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध और दीन ब्राह्मण का वेश धारण कर राजमहल के द्वार पर आए। उन्होंने महारानी से भिक्षा मांगी और आशीर्वाद देते हुए कहा, “हे महारानी! यदि आप बृहस्पतिवार का व्रत रखें, तो आपके सभी दुख दूर होंगे और आपका अहंकार समाप्त होकर आपको सच्ची शांति मिलेगी।” महारानी ने ब्राह्मण का उपहास करते हुए कहा, “हमारे पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं है। हमें किसी व्रत की आवश्यकता नहीं। आप जाइए।” ब्राह्मण ने धैर्यपूर्वक कहा, “महारानी, अहंकार पतन का कारण होता है। बृहस्पतिवार का व्रत भगवान बृहस्पति देव और विष्णु भगवान को समर्पित है। यह व्रत ज्ञान, सुख और संतान प्रदान करता है।” महारानी ने ब्राह्मण की बात अनसुनी कर दी और उन्हें खाली हाथ लौटा दिया।

महारानी के इस अनुचित व्यवहार के कारण धीरे-धीरे उनके भाग्य में परिवर्तन आने लगा। उनके राज्य की समृद्धि घटने लगी। उनके पुत्र, जो राजपाट संभालने योग्य थे, उनके हाथों से सत्ता फिसलने लगी। उनके दामाद भी उन्हें छोड़कर चले गए। देखते ही देखते, राजघराने पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। धन-धान्य समाप्त हो गया, सैनिक विद्रोह करने लगे, और पूरा राज्य दरिद्रता की चपेट में आ गया। राजा और रानी को मजबूरन राजमहल छोड़कर एक सामान्य झोपड़ी में जीवन यापन करना पड़ा।

एक दिन, घोर गरीबी और कष्ट में डूबी महारानी ने अपने पति राजा से पूछा, “हे प्राणनाथ! हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? हमने ऐसा क्या पाप किया है?” राजा ने दुखी मन से कहा, “प्रिये, यह सब तुम्हारे अहंकार और दान-पुण्य से विमुख होने का परिणाम है। मुझे याद है, एक बार एक वृद्ध ब्राह्मण आए थे, जिन्होंने तुम्हें बृहस्पतिवार का व्रत रखने की सलाह दी थी, पर तुमने उनका तिरस्कार किया था।”

राजा की बातें सुनकर महारानी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसू आ गए। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ बृहस्पतिवार का व्रत रखेंगी। अगले गुरुवार को उन्होंने सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान किया, पीले वस्त्र धारण किए और सच्चे मन से भगवान विष्णु तथा बृहस्पति देव का स्मरण किया। उनके पास पूजा के लिए कुछ भी नहीं था, पर उन्होंने पास के जंगल से केले के पत्ते तोड़े, और चने की दाल और गुड़ से बनी एक छोटी सी प्रसाद की थाली तैयार की। उन्होंने केले के पेड़ के नीचे बैठकर ब्राह्मण द्वारा बताई गई विधि से पूजा की और मन ही मन प्रार्थना की।

महारानी ने यह व्रत पूर्ण निष्ठा और धैर्य के साथ कई गुरुवार तक किया। प्रारंभ में तो कोई परिवर्तन नहीं आया, पर उनकी श्रद्धा अटल रही। धीरे-धीरे, उनकी भक्ति का फल मिलने लगा। एक दिन, एक व्यापारी उनके द्वार पर आया और उन्हें कुछ सोने के सिक्के दिए, जिनके बारे में उसने बताया कि उन्हें किसी राजघराने को दान करना था। महारानी ने उन सिक्कों से कुछ आवश्यक वस्तुएँ खरीदीं और अपना जीवन थोड़ा सुधारा।

उसी दौरान, उनके पुत्रों को अपने पिता-माता की दुर्दशा का ज्ञान हुआ। वे अपनी गलतियों का पश्चाताप करते हुए लौटे और अपनी माँ को फिर से राजमहल में ले गए। महारानी ने उन्हें भी बृहस्पतिवार व्रत के महत्व के बारे में बताया और उन्हें भी धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। महारानी ने अपने दामादों को भी वापस बुला लिया और उनके जीवन में भी सुख-शांति लौट आई।

धीरे-धीरे, राजा का राज्य फिर से धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। महारानी ने अपने पुराने अहंकार को त्याग दिया था। वे अब गरीबों और संतों का सम्मान करती थीं और दान-पुण्य में विश्वास रखती थीं। उनके जीवन में सच्ची सुख-शांति लौट आई थी। वे समझ चुकी थीं कि धन-संपत्ति क्षणभंगुर है, परंतु धर्म, humility (विनम्रता), और सेवाभाव ही असली सुख का मार्ग है। उन्होंने अपनी प्रजा को भी बृहस्पतिवार व्रत के महत्व के बारे में बताया और सभी को श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार, महारानी ने अपने कर्मों का फल पाया और भगवान बृहस्पति देव की कृपा से उनका जीवन धन्य हो गया।

दोहा
बृहस्पति देव दयालु हैं, करते सबकी पीर हरण।
जो श्रद्धा से व्रत करें, सफल होय जीवन मरण॥

चौपाई
जय जय जय श्री बृहस्पति देवा, करते हर कष्ट की सेवा।
पीत वस्त्रधारी मन भावन, विष्णु रूप, भक्तों के सावन॥
ज्ञान बुद्धि के दाता तुम ही, सकल मनोरथ पूर्ण करते सही।
चरण शरण जो आवे स्वामी, सफल करें सब जग के कामी॥

पाठ करने की विधि
बृहस्पतिवार व्रत का पालन अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाना चाहिए।
1. **व्रत का संकल्प:** यह व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से आरंभ किया जा सकता है। कम से कम 16 गुरुवार या अपनी मनोकामना पूर्ण होने तक व्रत रखने का संकल्प लें।
2. **सुबह की तैयारी:** गुरुवार के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें।
3. **पूजन सामग्री:** भगवान बृहस्पति देव और विष्णु जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। एक केले का पेड़ भी गमले में या घर के बाहर हो तो उसकी पूजा करें। पूजन सामग्री में पीला चंदन, हल्दी, पीले फूल, पीली मिठाई (बेसन के लड्डू, पीले चावल), चने की दाल, गुड़, जल, घी का दीपक, धूप और व्रत कथा की पुस्तक रखें।
4. **पूजा विधि:** पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। फिर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का ध्यान करें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान की प्रतिमा स्थापित करें। केले के पेड़ की जड़ में हल्दी, चने की दाल और गुड़ चढ़ाएं, जल अर्पित करें। दीपक जलाएं और धूप करें।
5. **कथा वाचन:** ‘बृहस्पतिवार व्रत कथा’ का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। कथा सुनने या पढ़ने के बाद आरती करें।
6. **प्रसाद वितरण:** प्रसाद को भक्तों और परिवारजनों में बांटें। स्वयं भी थोड़ा प्रसाद ग्रहण करें।
7. **भोजन:** इस दिन एक समय भोजन ग्रहण किया जाता है, जिसमें नमक नहीं मिलाया जाता। भोजन में पीले रंग की वस्तुओं का सेवन शुभ माना जाता है, जैसे बेसन के लड्डू, पीले चावल, केला, आम आदि। व्रतधारी चाहें तो सिर्फ फलहार भी कर सकते हैं।
8. **दान:** सामर्थ्य अनुसार पीली वस्तुएँ, जैसे चने की दाल, हल्दी, पीले वस्त्र, सोना आदि का दान करना शुभ माना जाता है।

पाठ के लाभ
बृहस्पतिवार व्रत को अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके नियमित और श्रद्धापूर्वक पालन से अनेक शुभ लाभ प्राप्त होते हैं:
1. **सुख-समृद्धि:** यह व्रत घर में धन-धान्य और वैभव लाता है। आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
2. **ज्ञान और बुद्धि:** बृहस्पति देव को ज्ञान का अधिष्ठाता माना जाता है। यह व्रत व्यक्ति को बुद्धिमान, विवेकशील और ज्ञानी बनाता है।
3. **संतान प्राप्ति:** जिन दंपत्तियों को संतान की कामना होती है, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होता है।
4. **विवाह बाधा निवारण:** अविवाहित युवक-युवतियों के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
5. **स्वास्थ्य लाभ:** यह व्रत शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, रोगों से मुक्ति दिलाता है।
6. **गृह क्लेश मुक्ति:** पारिवारिक जीवन में शांति और सौहार्द स्थापित होता है। क्लेश और मनमुटाव दूर होते हैं।
7. **मान-सम्मान:** समाज में प्रतिष्ठा और यश की प्राप्ति होती है।
8. **मनोकामना पूर्ति:** सच्चे हृदय से की गई कोई भी मनोकामना इस व्रत के प्रभाव से पूर्ण होती है।
9. **गुरु ग्रह की शांति:** कुंडली में यदि गुरु ग्रह कमजोर हो, तो यह व्रत उसके नकारात्मक प्रभावों को शांत करता है।

नियम और सावधानियाँ
बृहस्पतिवार व्रत के दौरान कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना आवश्यक है:
1. **स्वच्छता:** व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखें।
2. **बाल धोना और शेविंग:** इस दिन बाल धोना, कपड़े धोना और शेविंग करना वर्जित माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इन कार्यों से गुरु ग्रह कमजोर होता है।
3. **नमक का त्याग:** व्रत के दिन नमक का सेवन न करें। केवल पीले रंग की वस्तुओं का सेवन करें। खट्टी वस्तुओं का सेवन भी वर्जित है।
4. **केले का सेवन:** जिस केले के पेड़ की पूजा की जाती है, उसके फल का सेवन स्वयं न करें। उसे ब्राह्मण या अन्य लोगों को दान कर दें।
5. **दान:** व्रत के दिन यथाशक्ति चने की दाल, गुड़, हल्दी, पीले वस्त्र, पीली मिठाई आदि का दान अवश्य करें।
6. **झूठ और क्रोध:** व्रत के दिन झूठ बोलने, क्रोध करने और किसी का अनादर करने से बचें। मन को शांत और पवित्र रखें।
7. **ब्राह्मणों का सम्मान:** ब्राह्मणों, गुरुजनों और बड़ों का आदर करें।
8. **व्रत का पारण:** व्रत का पारण अगले दिन शुक्रवार को स्नान आदि करके करना चाहिए।

निष्कर्ष
बृहस्पतिवार व्रत कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि श्रद्धा, धैर्य और विश्वास का एक पवित्र प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि अहंकार का त्याग और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन में सच्ची सुख-शांति और समृद्धि लाता है। महारानी की कथा हमें यह संदेश देती है कि कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आए, यदि हम धैर्य और निष्ठा से धर्म का पालन करें, तो भगवान बृहस्पति देव और भगवान विष्णु की कृपा से सभी कष्ट दूर होते हैं। यह व्रत न केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है, बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध बनाता है, उसे ज्ञान और सद्बुद्धि प्रदान करता है। तो आइए, हम भी इस पावन व्रत को सच्चे हृदय से अपनाएं और अपने जीवन को भगवान की असीम कृपा से आलोकित करें। आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि सदैव बनी रहे, यही मंगल कामना है।

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Category:
व्रत और त्यौहार, धार्मिक कथाएँ, भगवान विष्णु
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Tags:
बृहस्पतिवार व्रत, गुरुवर व्रत, बृहस्पति देव, विष्णु पूजा, व्रत कथा, गुरुवार महिमा, संतान प्राप्ति व्रत, धार्मिक कथाएँ

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