पहला ज्योतिर्लिंग: महादेव के आदि और अंतहीन स्वरूप की अलौकिक कथा
सनातन धर्म में भगवान शिव को ‘महादेव’ के नाम से पूजा जाता है, जो सृष्टि के संहारक, पालक और आदिगुरु हैं। उनके अनेक रूप हैं – सौम्य, रौद्र, नटराज, अर्धनारीश्वर। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ज्योतिर्लिंग क्या हैं और इनका प्राकट्य कैसे हुआ? आइए, आज हम महादेव के उस अलौकिक स्वरूप की कथा में गोता लगाते हैं, जहाँ से पहले ज्योतिर्लिंग का उद्भव हुआ, और जिसने ब्रह्मा व विष्णु को भी शिव की अनंतता का बोध कराया।
सृष्टि की सर्वोच्चता पर विवाद: ब्रह्मा और विष्णु का संवाद
एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और पालनहार भगवान विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर एक गहन विवाद छिड़ गया। दोनों ही स्वयं को सर्वोच्च सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे। यह विवाद इतना बढ़ गया कि पूरी सृष्टि में हलचल मच गई।
जब यह बहस चरम पर थी, तभी अचानक उनके सामने एक विशाल, अनंत और तेजोमय प्रकाश स्तंभ प्रकट हुआ। यह इतना विशाल था कि इसका न तो कोई आदि दिख रहा था और न ही कोई अंत। इसकी चमक से तीनों लोक चकाचौंध हो गए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही इस अद्भुत दृश्य को देखकर विस्मय में पड़ गए और उनका विवाद वहीं थम गया।
ज्योतिर्लिंग का रहस्य: आदि और अंत की खोज
इस अद्भुत प्रकाश स्तंभ को देखकर दोनों देवताओं ने निर्णय लिया कि जो कोई भी इस स्तंभ का आदि या अंत सबसे पहले खोज निकालेगा, वही वास्तव में सर्वोच्च कहलाएगा।
- भगवान ब्रह्मा ने तुरंत हंस का रूप धारण किया और प्रकाश स्तंभ के ऊपरी सिरे को खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ चले।
- वहीं, भगवान विष्णु ने वराह का विकराल रूप धारण किया और उसके निचले सिरे को जानने के लिए पाताल लोक की गहराइयों में उतर गए।
हजारों वर्षों तक दोनों देवता अथक प्रयास करते रहे, लेकिन न तो ब्रह्मा को उसका शीर्ष मिला और न ही विष्णु को उसका आधार। यह स्तंभ अनंत था, जिसका न कोई प्रारंभ था और न ही कोई अंत।
ब्रह्मा का असत्य और शिव का प्राकट्य
जब ब्रह्मा ऊपर की ओर उड़ रहे थे, तब उन्होंने एक केतकी फूल को नीचे आते देखा। ब्रह्मा ने केतकी फूल को झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया कि वह यह गवाही दे कि ब्रह्मा ने स्तंभ का ऊपरी सिरा देख लिया है।
जब दोनों देवता वापस लौटे, तो भगवान विष्णु ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि वे स्तंभ का आधार नहीं खोज पाए। परंतु, भगवान ब्रह्मा ने गर्व से कहा कि उन्होंने ऊपरी सिरा देख लिया है और केतकी फूल ने उनकी गवाही दी।
ब्रह्मा के इस असत्य कथन पर वह विशाल प्रकाश स्तंभ बीच से फट गया और उसमें से भगवान शिव अपने पूर्ण विराट स्वरूप में प्रकट हुए। शिव ने ब्रह्मा के झूठ को उजागर किया और उन्हें श्राप दिया कि उनकी पृथ्वी पर कभी पूजा नहीं होगी (हालांकि, कुछ अन्य शास्त्रों में ब्रह्मा की पूजा के अन्य कारण भी बताए गए हैं)। शिव ने केतकी फूल को भी श्राप दिया कि वह कभी भी शिव की पूजा में प्रयोग नहीं होगा।
ज्योतिर्लिंग का संदेश: शिव की अनंतता और सर्वोच्चता
यह घटना ‘लिंगोद्भव’ (लिंग का उद्भव) के नाम से जानी जाती है और इसी से प्रथम ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य हुआ। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के निराकार, अनंत और अविनाशी स्वरूप का प्रतीक है। यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और प्रतिस्पर्धा व्यर्थ हैं, और केवल विनम्रता तथा सत्य ही हमें वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाते हैं।
ज्योतिर्लिंग, शिव के सर्वोच्च और आदि-अनंत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके आगे त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी अपनी सीमाएँ स्वीकार करते हैं। भारत में १२ प्रमुख ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, जो शिव के इसी दिव्य प्रकाश स्तंभ के भिन्न-भिन्न अंश माने जाते हैं, जहाँ स्वयं महादेव वास करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं।
निष्कर्ष: शिव भक्ति और सत्य का मार्ग
महादेव की यह कथा हमें बताती है कि सच्चा ज्ञान और मोक्ष अहंकार में नहीं, बल्कि स्वयं को जानने और परम सत्ता के प्रति समर्पण में निहित है। भगवान शिव का यह विराट स्वरूप हमें यह भी याद दिलाता है कि ब्रह्मांड और उसके सृजनकर्ता की लीला अनंत है, जिसे हम अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह नहीं समझ सकते, केवल अनुभव कर सकते हैं।
आइए, हम भी महादेव के इस अनंत स्वरूप का ध्यान करें और सत्य तथा विनम्रता के मार्ग पर चलते हुए शिव भक्ति में लीन हों। हर हर महादेव!

