नए साल में शुभता और समृद्धि के लिए पूजा
प्रस्तावना
नव वर्ष का आगमन केवल एक कैलेंडर की तारीख का बदलना नहीं, बल्कि यह जीवन के एक नए अध्याय का प्रारंभ है। यह समय है जब हम विगत को पीछे छोड़कर, नवीन ऊर्जा और उत्साह के साथ भविष्य की ओर देखते हैं। सनातन धर्म में, किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ ईश्वर के स्मरण और आशीर्वाद से करने की परंपरा है। नए साल की शुरुआत में की गई पूजा-अर्चना न केवल मन को शांति प्रदान करती है, बल्कि वर्ष भर शुभता, समृद्धि, आरोग्य और सफलता के द्वार भी खोलती है। यह लेख आपको नव वर्ष में की जाने वाली एक विशेष पूजा विधि और उसके महत्व से अवगत कराएगा, जिससे आपका आने वाला वर्ष दिव्यता और कल्याण से परिपूर्ण हो सके। यह एक ऐसा पावन अवसर है जब हम अपनी आत्मा को शुद्ध कर, ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारा आने वाला समय सुखमय और मंगलमय हो। यह परंपरा हमें अपने पूर्वजों से मिली है, जो जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर ईश्वर का स्मरण कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे। नए वर्ष का यह संकल्प हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है और हमें एक सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। इस पूजा के माध्यम से हम ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जुड़ते हैं और अपने जीवन में सकारात्मकता को आकर्षित करते हैं।
पावन कथा
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से राज्य में धर्मवीर नामक एक राजा राज करते थे। राजा धर्मवीर अत्यंत प्रजावत्सल और न्यायप्रिय थे, किंतु उनका राज्य कई वर्षों से सूखे और दरिद्रता से जूझ रहा था। प्रजा दुखी थी और राजा स्वयं भी चिंतित रहते थे कि वे अपनी प्रजा को इस संकट से कैसे उबारें। खेतों में फसलें सूख रही थीं, कुएँ और नदियाँ जलविहीन हो चुकी थीं, और राज्य का कोष भी खाली हो रहा था। प्रजा में निराशा और हताशा का भाव व्याप्त था, जिससे राजा का हृदय और भी भारी हो रहा था। उन्हें रातों की नींद हराम थी, यह सोचते हुए कि वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे करें।
एक बार, नए वर्ष के आगमन से ठीक पहले, राजा धर्मवीर ने अपने गुरु वशिष्ठ से मार्गदर्शन मांगा। गुरु वशिष्ठ एक सिद्ध संत थे और उन्हें दैवीय शक्तियों का ज्ञान था। वे अपने आश्रम में गहन तपस्या में लीन रहते थे और केवल विशेष परिस्थितियों में ही राजा या किसी श्रद्धालु से मिलते थे। राजा ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से विनती की, “हे गुरुदेव! मेरा राज्य वर्षों से अभावों से घिरा है। नव वर्ष आने वाला है, किंतु मेरे मन में कोई उत्साह नहीं है, क्योंकि मैं अपनी प्रजा को सुखी नहीं देख पा रहा। हर ओर अकाल और दरिद्रता का साया है। कृपा करके कोई ऐसा मार्ग बताएं जिससे आने वाला वर्ष हमारे लिए शुभता और समृद्धि लेकर आए और मेरी प्रजा का जीवन खुशहाल हो सके।” राजा की आँखों में आँसू थे, जो उनकी प्रजा के प्रति उनकी गहरी चिंता और प्रेम को दर्शा रहे थे।
गुरु वशिष्ठ ने कुछ क्षण के लिए अपनी आँखें बंद कीं और गहन ध्यान में लीन हो गए। उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज छा गया। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए आँखें खोलीं और बोले, “हे राजन! चिंता मत करो। आने वाला वर्ष निश्चय ही तुम्हारे और तुम्हारी प्रजा के लिए मंगलकारी होगा, यदि तुम श्रद्धा और पूर्ण विश्वास के साथ एक विशेष पूजा का आयोजन करो। यह पूजा केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और सामूहिक संकल्प का प्रतीक होगी।”
गुरुदेव ने आगे बताया, “आने वाले नव वर्ष के प्रथम दिन, सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र स्नान करो। तत्पश्चात, अपने राज्य के सबसे प्राचीन और पवित्र पीपल वृक्ष के नीचे एक भव्य यज्ञशाला का निर्माण कराओ। पीपल का वृक्ष दैवीय ऊर्जा का प्रतीक है और इसके नीचे की गई तपस्या या पूजा अधिक फलदायी होती है। इस यज्ञशाला में सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान गणेश का आह्वान करो, क्योंकि वे ही सभी विघ्नों को दूर करने वाले हैं और किसी भी शुभ कार्य की निर्विघ्न समाप्ति के लिए उनका पूजन अनिवार्य है। उनके उपरांत, धन की देवी माँ लक्ष्मी और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का संयुक्त आह्वान करो। माँ लक्ष्मी धन-धान्य प्रदान करती हैं और माँ सरस्वती विवेक व बुद्धि देती हैं, जो समृद्धि के सही उपयोग के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही, सृष्टि के पालक भगवान विष्णु और उनकी अर्धांगिनी लक्ष्मी स्वरूप माँ दुर्गा का भी पूजन करो, क्योंकि वे ही संसार का पालन-पोषण करते हैं और बुरी शक्तियों से रक्षा करते हैं। इन सभी देवताओं का आह्वान कर, शुद्ध घी के दीपक प्रज्वलित करो, सुगंधित धूप अर्पित करो और वैदिक मंत्रों के साथ आहूतियाँ दो। इस पूजा में, अन्न, वस्त्र, फल और जल का दान अवश्य करो। यह दान उन लोगों को दिया जाए जो वास्तव में अभावग्रस्त हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूजा केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण हृदय की शुद्धता और निस्वार्थ भाव से प्रजा के कल्याण हेतु होनी चाहिए। तुम्हारा संकल्प ही इस पूजा की आत्मा होगा।”
गुरु वशिष्ठ ने आगे कहा, “इस पूजा के दौरान, तुम्हें एक विशेष संकल्प लेना होगा कि तुम और तुम्हारी प्रजा, आने वाले वर्ष में, प्रत्येक प्राणी के प्रति करुणा और सेवा का भाव रखेंगे, कोई जीव हिंसा नहीं करेगा और सभी मिलकर धर्म के मार्ग पर चलेंगे। सभी को एक दूसरे का सम्मान करना होगा और सत्य एवं न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा। यदि तुम इस संकल्प को पूर्ण निष्ठा से निभाओगे, तो निश्चय ही देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होगा और तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी, खेत खलिहान लहलहा उठेंगे और दरिद्रता का नामोनिशान मिट जाएगा। प्रकृति तुम पर अपनी कृपा बरसाएगी और धरती धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगी।”
राजा धर्मवीर ने गुरुदेव के वचनों को शिरोधार्य किया। उन्होंने तुरंत ही राज्य में उद्घोषणा करवा दी और नव वर्ष के प्रथम दिन, संपूर्ण राज्य ने मिलकर गुरुदेव द्वारा बताई गई विधि से महापूजा का आयोजन किया। राजा स्वयं अपनी प्रजा के साथ यज्ञशाला में बैठे और पूर्ण श्रद्धा से मंत्रोच्चार किया। सभी के मुख पर भक्ति का भाव था और आँखों में एक नए वर्ष के लिए आशा की किरण थी। पूरा राज्य एक साथ मिलकर ईश्वर से अपने कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहा था।
पूजा समाप्त होते ही आकाश में काले बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। यह वर्षा लगातार कई दिनों तक हुई, जिससे सूख चुके कुएँ, नदियाँ और तालाब फिर से भर गए। खेतों में नई जान आ गई। कुछ ही महीनों में राज्य में हरियाली छा गई, फसलें लहलहा उठीं और प्रजा के मुख पर मुस्कान लौट आई। किसानों के चेहरे खिल उठे और चारों ओर खुशी का माहौल छा गया।
अगले वर्ष तक, राजा धर्मवीर का राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। प्रजा सुखी और समृद्ध थी। राजा ने गुरु वशिष्ठ को धन्यवाद दिया और तब से हर नव वर्ष पर यह विशेष पूजा और संकल्प पूरे राज्य में एक परंपरा बन गई। यह कथा हमें सिखाती है कि नव वर्ष में सच्ची श्रद्धा और निस्वार्थ भाव से की गई पूजा, दान और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प, हमारे जीवन में और समाज में अपार शुभता और समृद्धि ला सकता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति और परमात्मा का आशीर्वाद तभी प्राप्त होता है जब हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं और दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं।
दोहा
नव वर्ष शुभ आशीष दे, मंगलमय हो काज।
ईश कृपा बरसे सदा, सुख शांति का राज।।
चौपाई
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी।।
राम सिया राम सिया राम जय जय राम।।
अर्थात: जो मंगल के धाम और अमंगलों (अशुभों) को हरने वाले हैं, वे दशरथनंदन (भगवान श्री राम) मुझ पर दया करें। यह चौपाई हमें यह विश्वास दिलाती है कि यदि हम सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण करते हैं, तो वे हमारे सभी कष्टों को दूर कर जीवन में शुभता और शांति प्रदान करते हैं। उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और हर बाधा स्वतः ही समाप्त हो जाती है।
पाठ करने की विधि
नव वर्ष में शुभता और समृद्धि के लिए की जाने वाली पूजा को आप अपने घर पर या किसी मंदिर में कर सकते हैं। यह पूजा मुख्यतः भगवान गणेश, माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु को समर्पित होती है, क्योंकि गणेश विघ्नहर्ता, लक्ष्मी धनदात्री और विष्णु पालक हैं। इस पूजा को करने से पहले पूरी तैयारी और समर्पण का भाव होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
१. **स्थान की शुद्धता**: पूजा के लिए एक शांत और स्वच्छ स्थान का चुनाव करें। उसे गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और यदि संभव हो तो गोबर से लेप करें। एक सुंदर चौकी या आसन बिछाएँ।
२. **सामग्री संग्रह**: पूजा के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित करें, जैसे- गणेश जी, लक्ष्मी जी और विष्णु जी की प्रतिमा या चित्र, जल से भरा कलश, नारियल, आम के पत्ते, रोली, चंदन, अक्षत (साबुत चावल), धूप, दीप (शुद्ध घी का), अगरबत्ती, ताजे फूल (कमल, गुलाब विशेष रूप से), माला, विभिन्न प्रकार के फल, मिठाई (मोदक, खीर, या कोई अन्य सात्विक मिठाई), पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण), पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची, मोली (कलावा), वस्त्र (मूर्ति के लिए), और दक्षिणा।
३. **स्नान और संकल्प**: नव वर्ष के प्रथम दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करें। स्वच्छ और धुल हुए वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल पर बैठकर हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर अपने नाम, गोत्र, स्थान और नव वर्ष में शुभता, समृद्धि, आरोग्य तथा कल्याण की प्राप्ति के उद्देश्य से पूजा करने का संकल्प लें। यह संकल्प आपकी पूजा की दिशा निर्धारित करता है।
४. **गणेश पूजन**: सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान गणेश का आह्वान करें। उन्हें रोली, चंदन, अक्षत, दूर्वा (हरी घास), और लड्डू अर्पित करें। “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का कम से कम ११ या २१ बार जाप करें। गणेश जी की पूजा किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में अनिवार्य है ताकि सभी बाधाएँ दूर हों और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो।
५. **कलश स्थापना**: एक मिट्टी या धातु के कलश को जल से भरें, उसमें कुछ सिक्के, सुपारी, चावल और एक हल्दी की गांठ डालें। उसके मुख पर आम के पाँच पत्ते लगाकर ऊपर एक नारियल रखें। कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाएँ और उसके गले में मोली बाँधें। यह कलश सभी देवी-देवताओं और शुभ ऊर्जा का प्रतीक है।
६. **विष्णु-लक्ष्मी पूजन**: भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उन्हें पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र अर्पित करें। रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर (लक्ष्मी जी के लिए), फूल, माला चढ़ाएँ। धूप-दीप प्रज्वलित करें। कमल का फूल माँ लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है, यदि संभव हो तो अर्पित करें। यह अत्यंत शुभ माना जाता है।
७. **मंत्र जाप**: भगवान विष्णु के “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और माँ लक्ष्मी के “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का कम से कम १०८ बार जाप करें। मंत्रों का जाप करते समय एकाग्रता और भक्ति भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
८. **आरती**: पूजा के अंत में भगवान गणेश, माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कपूर या शुद्ध घी के दीपक से श्रद्धापूर्वक आरती करें। आरती करते समय सभी परिवारजन एक साथ हों तो अधिक शुभ होता है।
९. **भोग और प्रसाद वितरण**: फल, मिठाई, पंजीरी या अन्य सात्विक भोग अर्पित करें। पूजा के बाद यह प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवारजनों तथा मित्रों में वितरित करें। प्रसाद बांटने से शुभता बढ़ती है।
१०. **दान**: अपनी श्रद्धा अनुसार अन्न, वस्त्र या धन का दान अवश्य करें। दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और समृद्धि बढ़ती है। गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना सर्वोच्च पुण्य माना गया है।
यह पूजा विधि आपके नव वर्ष को दैवीय आशीर्वाद से भर देगी और शुभता का संचार करेगी। इस पूजा को करने से आपके मन में शांति और संतोष का भाव आएगा और आप पूरे वर्ष सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत रहेंगे।
पाठ के लाभ
नव वर्ष के पावन अवसर पर सच्ची श्रद्धा और पूर्ण विधि-विधान से की गई यह पूजा अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करती है, जो केवल भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक भी होते हैं:
१. **समृद्धि और धन लाभ**: माँ लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है, धन आगमन के नए स्रोत खुलते हैं और व्यापार व नौकरी में उन्नति होती है। घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती और सभी प्रकार के आर्थिक संकट दूर होते हैं।
२. **शुभता और सौभाग्य**: भगवान गणेश के आशीर्वाद से वर्ष भर आने वाले सभी विघ्न और बाधाएँ दूर होती हैं, जिससे हर कार्य में सफलता मिलती है और सौभाग्य में वृद्धि होती है। दुर्भाग्य का नाश होता है और जीवन में सकारात्मक घटनाएँ घटित होती हैं।
३. **मानसिक शांति और सकारात्मकता**: यह पूजा मन को शांति प्रदान करती है, तनाव को कम करती है और पूरे वर्ष के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। व्यक्ति चिंतामुक्त होकर अपने कार्यों में प्रवृत्त हो पाता है।
४. **पारिवारिक सौहार्द**: घर में सुख-शांति और प्रेम का वातावरण बनता है। परिवार के सदस्यों के बीच आपसी तालमेल और समझ बढ़ती है, जिससे घर में कलह और विवादों का अंत होता है।
५. **आरोग्य और उत्तम स्वास्थ्य**: दैवीय कृपा से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है, रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में आरोग्य का वास होता है। व्यक्ति स्वस्थ जीवन जीता है और दीर्घायु प्राप्त करता है।
६. **ज्ञान और विवेक**: माँ सरस्वती का अप्रत्यक्ष आशीर्वाद मिलता है, जिससे सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और जीवन के हर क्षेत्र में बुद्धिमत्ता से कार्य कर पाते हैं। विद्यार्थियों के लिए यह विशेष रूप से लाभप्रद होता है।
७. **आध्यात्मिक उन्नति**: पूजा-पाठ से मन में वैराग्य और ईश्वर के प्रति भक्ति का भाव जागृत होता है, जिससे आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति होती है और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आता है।
८. **समाज में प्रतिष्ठा**: शुभ कर्मों और दैवीय कृपा से व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उसके कार्यों की सराहना होती है और वह समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनता है।
ये सभी लाभ मिलकर आपके आने वाले वर्ष को एक सफल, सुखी और संतोषजनक जीवन में परिवर्तित कर सकते हैं। यह पूजा केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूरे वर्ष के लिए एक सकारात्मक नींव रखने का माध्यम है।
नियम और सावधानियाँ
किसी भी धार्मिक कार्य को करते समय कुछ नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि उसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके और किसी प्रकार के दोष से बचा जा सके।
१. **शुद्धता**: पूजा करने वाले व्यक्ति का शरीर और मन शुद्ध होना चाहिए। पूजा से पूर्व पवित्र स्नान करें और स्वच्छ, धुल हुए वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल भी पूरी तरह स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए। किसी भी प्रकार की गंदगी या अशुद्धि नहीं होनी चाहिए।
२. **सात्विक आहार**: पूजा के दिन और यदि संभव हो तो पूजा से एक दिन पहले से भी, सात्विक भोजन ग्रहण करें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा, अंडे और अन्य तामसिक वस्तुओं का सेवन पूर्णतः वर्जित है। केवल फल, दूध, दही, अनाज और सब्जियाँ ग्रहण करें।
३. **शांत और पवित्र वातावरण**: पूजा के दौरान किसी भी प्रकार का शोरगुल, विवाद या नकारात्मक बातें नहीं होनी चाहिए। मोबाइल फोन बंद रखें और एकाग्रचित्त होकर पूर्ण शांति के साथ पूजा करें। परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस वातावरण को बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए।
४. **श्रद्धा और विश्वास**: किसी भी पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सच्ची श्रद्धा और अटूट विश्वास। बिना श्रद्धा के की गई पूजा फलदायी नहीं होती। मन में किसी भी प्रकार का संशय या संदेह नहीं होना चाहिए।
५. **ईमानदारी और निस्वार्थ भाव**: पूजा केवल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए की जानी चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध या लोभ का भाव न हो। पूजा करते समय केवल परमार्थ का चिंतन करें।
६. **अशुभ काल का त्याग**: राहुकाल या अन्य किसी अशुभ मुहूर्त में पूजा का प्रारंभ न करें। यदि आपको मुहूर्त का ज्ञान नहीं है, तो किसी योग्य ज्योतिषी या पंडित से सलाह लें। शुभ मुहूर्त में की गई पूजा ही पूर्ण फल प्रदान करती है।
७. **नियमों का पालन**: पूजा विधि में बताए गए सभी चरणों का यथासंभव पालन करें। यदि किसी सामग्री का अभाव हो तो मन में उसका स्मरण कर लें, किंतु विधि में त्रुटि न करें। भगवान भाव के भूखे हैं, सामग्री के नहीं।
८. **ब्रह्मचर्य का पालन**: पूजा के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मन और शरीर को पवित्र और संयमित रखें।
९. **स्वच्छता का ध्यान**: पूजा के लिए उपयोग की जाने वाली सभी सामग्री, जैसे बर्तन, फूल, दीपक आदि, स्वच्छ और पवित्र होने चाहिए।
इन नियमों और सावधानियों का पालन करने से आपकी पूजा सफल होगी और आपको उसका संपूर्ण पुण्यफल प्राप्त होगा। यह आपको आंतरिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का अनुभव भी कराएगा।
निष्कर्ष
नव वर्ष का आगमन केवल एक कैलेंडर की तारीख का बदलना नहीं है, बल्कि यह जीवन के एक नए अध्याय का प्रारंभ है। यह समय हमें आत्मनिरीक्षण करने, अपनी गलतियों से सीखने और एक बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर होने का अवसर देता है। सनातन धर्म की यह पावन परंपरा हमें सिखाती है कि हम अपने जीवन की शुरुआत ईश्वर के आशीर्वाद से करें, क्योंकि वही परम शक्ति है जो हमारे जीवन को दिशा देती है और हमें हर कठिनाई से पार उतारती है।
यह नव वर्ष की पूजा केवल एक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि आपके संकल्पों, आपकी आस्था और आपके भविष्य के प्रति आपकी आशा का प्रतीक है। जब आप पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ इस पूजा को करते हैं, तो आप न केवल अपने लिए, बल्कि अपने परिवार और समाज के लिए भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। यह एक सामूहिक प्रार्थना है जो पूरे वातावरण को पवित्र कर देती है।
आइए, हम सब मिलकर इस नव वर्ष को भगवान के चरणों में समर्पित करें और उनसे प्रार्थना करें कि यह आने वाला वर्ष हमारे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और परम आनंद लेकर आए। आपके घर में माँ लक्ष्मी का वास हो, भगवान गणेश सभी विघ्नों को हरें और भगवान विष्णु आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करें। यह वर्ष आपके जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और संतोष लेकर आए। नव वर्ष मंगलमय हो! आपका जीवन दिव्य प्रकाश से आलोकित हो और हर दिन एक नया अवसर लेकर आए।

