नवरात्रि, शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना का महापर्व है। यह वह समय है जब ब्रह्मांड में देवी शक्ति का विशेष संचार होता है, और भक्तगण माँ के नौ दिव्य रूपों की पूजा कर उनकी असीम कृपा के पात्र बनते हैं। यह लेख बताता है कि कैसे सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से माँ दुर्गा की पूजा कर उनकी सर्वकल्याणकारी कृपा को सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें पूजा विधि, लाभ, नियम और एक पावन कथा शामिल है।

नवरात्रि, शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना का महापर्व है। यह वह समय है जब ब्रह्मांड में देवी शक्ति का विशेष संचार होता है, और भक्तगण माँ के नौ दिव्य रूपों की पूजा कर उनकी असीम कृपा के पात्र बनते हैं। यह लेख बताता है कि कैसे सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से माँ दुर्गा की पूजा कर उनकी सर्वकल्याणकारी कृपा को सहजता से प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें पूजा विधि, लाभ, नियम और एक पावन कथा शामिल है।

प्रस्तावना
नवरात्रि, नौ रातों का महापर्व, शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना का परम पावन समय है। यह वह अवधि है जब ब्रह्मांड में देवी शक्ति का विशेष संचार होता है, और भक्तगण माँ के नौ दिव्य रूपों की पूजा कर उनकी असीम कृपा के पात्र बनते हैं। माँ दुर्गा, दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों का कल्याण करने वाली परमेश्वरी हैं। उनकी कृपा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं, भय का नाश होता है और सुख-शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह पर्व हमें आंतरिक शक्ति और पवित्रता का महत्व सिखाता है। इस विशेष काल में कैसे हम माँ दुर्गा के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर उनकी सर्वकल्याणकारी कृपा को सहजता से प्राप्त कर सकते हैं, आइए हम इसी गूढ़ रहस्य को जानने का प्रयास करें।

पावन कथा
प्राचीन काल में महिषासुर नामक एक अत्यंत बलशाली राक्षस हुआ, जिसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे कोई भी पुरुष, देवता, दानव या मनुष्य नहीं मार सकता। वरदान मिलते ही महिषासुर का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और इंद्र सहित सभी देवताओं को पराजित कर स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। देवतागण भयभीत होकर इधर-उधर भटकने लगे। जब महिषासुर के अत्याचार असहनीय हो गए, तब सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शरण में गए। उन्होंने अपनी करुण पुकार से तीनों लोकों के सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता को महिषासुर के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेवों को अत्यंत क्रोध आया। उनके क्रोध और सभी देवताओं के तेज पुंज से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह शक्ति एक दिव्य नारी के रूप में अवतरित हुई, जिनके मुखमंडल से अनंत तेज फूट रहा था। भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, इंद्र ने वज्र, ब्रह्मा ने कमंडल, वायु ने धनुष-बाण, अग्नि ने शक्ति और अन्य सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इस प्रकार, सर्वशक्तिमान देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ, जो अष्टभुजा धारिणी, सिंहवाहिनी और परम तेजस्वी थीं। उनके रूप को देखकर महिषासुर पहले तो अचंभित हुआ, फिर उसे लगा कि वह इस दिव्य नारी को आसानी से पराजित कर सकता है।

देवी दुर्गा ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना के साथ भयंकर युद्ध किया। यह युद्ध नौ दिनों तक चला, जिसमें देवी ने एक-एक कर महिषासुर के सभी सेनापतियों और असुरों का संहार कर दिया। अंत में, दसवें दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ महाभयंकर युद्ध किया। महिषासुर ने अनेक रूप धारण किए, कभी वह भैंसे के रूप में आया तो कभी सिंह के रूप में, पर माँ दुर्गा ने हर बार उसके छल को विफल कर दिया। अंततः, जब महिषासुर अपने भैंसे के रूप से बाहर निकलकर युद्ध कर रहा था, तब माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उसके हृदय पर प्रहार कर उसका वध कर दिया। महिषासुर का वध होते ही तीनों लोकों में शांति छा गई। देवतागणों ने प्रसन्न होकर माँ दुर्गा की जय-जयकार की और उन्हें अनेक स्तुतियों से पूजित किया। तभी से माँ दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। यह पावन कथा हमें बताती है कि जब भी धर्म पर संकट आता है और भक्तगण सच्चे हृदय से माँ को पुकारते हैं, तो माँ अवश्य प्रकट होकर उनकी रक्षा करती हैं और उन्हें अपनी कृपा से कृतार्थ करती हैं। उनकी कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है और भक्त हर बाधा से पार पा लेते हैं।

दोहा
शरणागत की लाज रखत, जननी जग कल्याणी।
मातु तेरी कृपा बिनु, सूनी सकल कहानी।।

चौपाई
मंगल मूरति माँ दुर्गा, संकट हरणी सुखदई।
सिंहवाहिनी अष्टभुजा, शक्ति रूपिणी माई।।
निशिदिन ध्यावें जो जन तोहे, भय न व्यापे भव सागर माहीं।
प्रेम भाव से जो टेरे, सकल मनोरथ पूरण हो जाहीं।।

पाठ करने की विधि
नवरात्रि में माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से की गई पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। सर्वप्रथम, सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। अपने पूजा स्थल को स्वच्छ कर गंगाजल छिड़कें। एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। कलश स्थापना करें, जिसमें मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और उस पर जल से भरा कलश रखा जाता है। कलश के मुख पर आम्र पल्लव और नारियल रखें। इसके बाद, माँ दुर्गा का आह्वान करें और उन्हें रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें।

प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। यदि पूर्ण सप्तशती पाठ संभव न हो, तो कम से कम “सिद्ध कुंजिका स्तोत्र” या “दुर्गा चालीसा” का पाठ अवश्य करें। माँ के नौ रूपों के अनुसार प्रत्येक दिन विशेष रूप की पूजा करें और उनसे संबंधित मंत्रों का जाप करें। जैसे, प्रथम दिन माँ शैलपुत्री के लिए ‘ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः’ का जाप करें। अपनी सामर्थ्य अनुसार कन्या पूजन करें और उन्हें भोजन कराकर दक्षिणा दें। माँ दुर्गा के मंदिर जाकर उनके दर्शन करें और चुनरी व श्रृंगार का सामान अर्पित करें। नवरात्रि के दौरान अखंड ज्योति जलाना भी शुभ माना जाता है। माँ की आरती करें और अपनी मनोकामनाएँ सच्चे हृदय से माँ के चरणों में समर्पित करें।

पाठ के लाभ
माँ दुर्गा की कृपा से भक्तों के जीवन में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। नवरात्रि में की गई विशेष पूजा और अनुष्ठानों से आत्मिक शांति मिलती है और मन शुद्ध होता है। माँ दुर्गा सभी प्रकार के भय, शत्रु और बाधाओं का नाश करती हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति को आत्मविश्वास और साहस प्राप्त होता है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना कर पाता है। रोगों से मुक्ति मिलती है और आरोग्य की प्राप्ति होती है। माँ की आराधना से दरिद्रता का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि, धन-धान्य का आगमन होता है। संतानहीन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। विद्यार्थियों को विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है। माँ दुर्गा की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और जीवन में आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह पूजा न केवल भौतिक सुख देती है, बल्कि आंतरिक शक्ति और सकारात्मकता का संचार भी करती है।

नियम और सावधानियाँ
नवरात्रि के पावन पर्व पर पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अनिवार्य है। सबसे पहले, ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक जीवन शैली अपनाएँ। तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, माँस, मदिरा का सेवन बिल्कुल न करें। उपवास रखने वाले भक्त अन्न का त्याग कर फलाहार करें। यदि पूरे नौ दिन का उपवास संभव न हो तो प्रथम और अंतिम दिन का उपवास अवश्य करें। कलश स्थापना करने वाले भक्तों को नौ दिनों तक घर खाली छोड़कर कहीं बाहर नहीं जाना चाहिए। स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें, पूजा स्थल और स्वयं को स्वच्छ रखें। मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध या नकारात्मक विचार न लाएँ। ब्रह्मचर्य का पालन करना और जमीन पर सोना भी कुछ भक्त पसंद करते हैं। दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय शुद्ध उच्चारण का ध्यान रखें। पाठ के दौरान बीच में न उठें। किसी भी नियम का उल्लंघन करने से पूजा का फल कम हो सकता है। पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ इन नियमों का पालन करने से माँ दुर्गा की असीम कृपा निश्चित रूप से प्राप्त होती है।

निष्कर्ष
नवरात्रि माँ दुर्गा की शक्ति, भक्ति और त्याग का प्रतीक है। यह वह समय है जब प्रकृति भी एक नई ऊर्जा से ओत-प्रोत होती है और समस्त वातावरण में सकारात्मकता का संचार होता है। माँ दुर्गा केवल एक देवी नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की आदि शक्ति हैं, जो अपनी ममतामयी दृष्टि से अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और उन्हें हर संकट से बचाती हैं। इस पावन पर्व पर सच्चे हृदय से की गई आराधना, जप, तप और दान पुण्य हमें माँ के दिव्य लोक के करीब ले जाता है। आइए, हम सब मिलकर इस नवरात्रि पर अपने मन-वचन-कर्म से माँ भगवती को प्रसन्न करें, उनके चरणों में अपनी श्रद्धा और प्रेम अर्पित करें। माँ दुर्गा की असीम कृपा से हमारा जीवन सुखमय, समृद्ध और आनंदमय बने, यही कामना है। जय माता दी!

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