नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा: तपस्या और संयम का महापर्व
प्रस्तावना
शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व, माँ दुर्गा के नौ दिव्य रूपों की आराधना का अनुपम अवसर है। यह नौ रातें और दस दिन, आत्मशुद्धि, शक्ति उपासना और आध्यात्मिक जागरण के प्रतीक हैं। प्रत्येक दिन माँ के एक विशिष्ट स्वरूप को समर्पित होता है, जिनकी पूजा-अर्चना से भक्तगण विशेष आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नवरात्रि का दूसरा दिन माँ भगवती के दूसरे स्वरूप, माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ यहाँ तपस्या और ‘चारिणी’ का अर्थ आचरण करने वाली है। इस प्रकार, माँ ब्रह्मचारिणी उस देवी का स्वरूप हैं जिन्होंने कठोर तपस्या और साधना का आचरण किया। वे तप, वैराग्य, संयम और अनुशासन की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं। उनकी उपासना से मन को स्थिरता मिलती है, इच्छाशक्ति प्रबल होती है और व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर अविचल भाव से अग्रसर होता है। यह दिन भक्तों को यह स्मरण कराता है कि जीवन में सफलता और सिद्धि प्राप्त करने के लिए तपस्या और संयम का मार्ग कितना महत्वपूर्ण है। माँ ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप भक्तों को अध्यात्म के उच्चतम शिखर तक पहुँचने की प्रेरणा देता है और उन्हें सांसारिक मोहमाया से विरक्त होकर सत्य की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाता है। उनकी आराधना से न केवल भौतिक इच्छाएँ पूर्ण होती हैं, अपितु आत्मा को भी परम शांति और संतुष्टि की अनुभूति होती है। आइए, हम सब इस पावन अवसर पर माँ ब्रह्मचारिणी के दिव्य गुणों का चिंतन करें और उनके चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर जीवन को धन्य करें।
पावन कथा
माँ ब्रह्मचारिणी की पावन कथा अनंत काल से भक्तों को प्रेरणा देती आ रही है। यह कथा भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती द्वारा की गई कठोर तपस्या की गाथा है। अपने पूर्व जन्म में देवी सती के रूप में भगवान शिव से विवाह करने के बाद, उन्होंने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति के अपमान के कारण आत्मदाह कर लिया था। यह घटना देवलोक और मृत्युलोक दोनों जगह पर हाहाकार मचाने वाली थी। भगवान शिव अत्यधिक दुखी हुए और उन्होंने सती के देह को लेकर तांडव किया, जिससे त्रिलोक में प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो गई। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर दिया, जिससे उनके अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
अगले जन्म में, उन्होंने हिमालय राज हिमवान और मैना देवी की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती का मन भगवान शिव में रम गया था और वे उन्हें ही अपना पति बनाना चाहती थीं। परंतु, भगवान शिव उस समय गहन तपस्या में लीन थे और वे किसी भी सांसारिक बंधन में बंधना नहीं चाहते थे। देवताओं और नारद मुनि ने पार्वती को शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या करने का परामर्श दिया। नारद मुनि ने उन्हें बताया कि शिव को केवल तपस्या से ही प्रसन्न किया जा सकता है।
अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए देवी पार्वती ने नारद मुनि के परामर्श पर कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया। उन्होंने हिमालय की कंदराओं और वनों में जाकर घोर तप करना प्रारंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर जीवन व्यतीत किया। उसके बाद उन्होंने सौ वर्षों तक केवल शाक पर ही जीवन निर्वाह किया। तत्पश्चात, उन्होंने कई हजार वर्षों तक केवल भूमि पर गिरे हुए बिल्व पत्र खाकर ही तपस्या की और अंत में बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया। बिल्व पत्र खाना छोड़ने के कारण उनका एक नाम ‘अपर्णा’ भी पड़ा। उनकी यह तपस्या इतनी तीव्र थी कि स्वयं देवता भी उनके धैर्य और संकल्प को देखकर अचंभित रह गए थे।
इस तपस्या की पराकाष्ठा यह थी कि उन्होंने हजारों वर्षों तक खुले आकाश के नीचे, धूप, वर्षा और शीत को सहते हुए, बिना अन्न-जल के घोर तप किया। उनके शरीर पर धूल जम गई, वे सूखकर काँटा हो गईं, परंतु उनके मुख पर तेज और मन में शिव प्राप्ति का दृढ़ संकल्प अटल रहा। उनकी इस अलौकिक तपस्या को देखकर देवी-देवता, ऋषि-मुनि और स्वयं ब्रह्मा जी भी चकित रह गए थे। वायुदेव ने उन्हें शुद्ध वायु प्रदान की, सूर्यदेव ने अपनी किरणों से उन्हें ऊर्जा दी और प्रकृति भी उनकी तपस्या में सहायक बनी।
जब स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और कहा, “हे देवी! आपकी तपस्या इतनी असाधारण है कि ऐसी तपस्या आज तक किसी ने नहीं की। आपके तप के कारण तीनों लोक काँप उठे हैं। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। भगवान शिव शीघ्र ही आपको पति रूप में स्वीकार करेंगे।” अंततः, भगवान शिव ने भी देवी पार्वती की इस अटूट श्रद्धा और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार, माँ ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप हमें यह सिखाता है कि सच्ची निष्ठा, अटूट श्रद्धा और कठोर तपस्या से असंभव को भी संभव किया जा सकता है। यह कथा हमें धैर्य, संकल्प और साधना के महत्व को समझाती है और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रेरणा देती है। माँ ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप भक्तों को सभी प्रकार के मोह से ऊपर उठकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने का आह्वान करता है। उनकी पूजा से मन को असीम शांति और आत्मबल प्राप्त होता है, जो जीवन की सभी बाधाओं को पार करने में सहायक होता है। उनकी यह कथा मानव जीवन के लिए एक मार्गदर्शक है, जो यह दर्शाती है कि दृढ़ संकल्प से हर चुनौती पर विजय पाई जा सकती है और आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं।
दोहा
माँ ब्रह्मचारिणी तप की खान, संयम का देती वरदान।
मन को शुद्ध करे यह नाम, मिट जाए जग के सब काम।।
चौपाई
जय जय माँ ब्रह्मचारिणी देवी, तपसी जन की तुम हो सेवी।
कमंडल माला धारण किन्हें, शिव को पाने व्रत को ठानिन्हें।।
घोर तपस्या तुमने कीन्ही, फल स्वरूप शिव को तुम लीन्ही।
ज्ञान वैराग्य की तुम दाता, मन को स्थिर करती माता।।
जो कोई शरणा में तेरी आवे, मनवांछित फल सो पावे।
सुख शांति और यश की खानी, जय माँ ब्रह्मचारिणी कल्याणी।।
पाठ करने की विधि
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा अत्यंत भक्तिभाव और विधि-विधान से करनी चाहिए। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ मानसिक शुद्धता भी आवश्यक है, अतः मन को शांत और सकारात्मक रखें। इसके पश्चात, पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक चौकी पर लाल या सफेद वस्त्र बिछाकर माँ ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। माँ को श्वेत रंग अत्यंत प्रिय है, अतः उनकी पूजा में सफेद पुष्प, विशेषकर चमेली, हरसिंगार या सफेद कनेर के फूल अर्पित करें।
सर्वप्रथम गणेश जी का ध्यान करें और उनका पूजन करें, क्योंकि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणपति की पूजा विघ्नहर्ता मानी जाती है। उसके बाद कलश देवता का पूजन करें, जिसमें जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालकर उस पर आम्रपल्लव और नारियल स्थापित किया जाता है। अब माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान करते हुए उन्हें आचमन कराएं, स्नान कराएं (पंचामृत या शुद्ध जल से), वस्त्र अर्पित करें, और चंदन, रोली, कुमकुम का तिलक लगाएं। माँ को सफेद पुष्पों की माला पहनाएं और धूप-दीप प्रज्ज्वलित करें। माँ ब्रह्मचारिणी को भोग में चीनी, सफेद मिठाई या मिश्री अत्यंत प्रिय है। अतः उन्हें ये वस्तुएं अर्पित करें। कुछ भक्त उन्हें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) भी चढ़ाते हैं।
इसके बाद, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और माँ ब्रह्मचारिणी के विशिष्ट मंत्रों का जाप करें। उनका मूल मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नमः” है। इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप रुद्राक्ष की माला से करें। आप माँ ब्रह्मचारिणी स्तोत्र और कवच का पाठ भी कर सकते हैं। मंत्र जाप से मन एकाग्र होता है और माँ की दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है। अंत में, कपूर या घी के दीपक से माँ ब्रह्मचारिणी की आरती करें। आरती के बाद क्षमा प्रार्थना करें कि हे माँ, पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए हमें क्षमा करें और अपनी कृपा हम पर बनाए रखें। उपस्थित सभी भक्तों को प्रसाद वितरित करें। पूजा के दौरान मन को शांत और एकाग्र रखें, किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार मन में न आने दें। यह विधि-विधान से की गई पूजा माँ ब्रह्मचारिणी को शीघ्र प्रसन्न करती है और भक्तों को उनके दिव्य आशीर्वाद से ओत-प्रोत करती है, जिससे जीवन में शांति और सफलता प्राप्त होती है।
पाठ के लाभ
माँ ब्रह्मचारिणी की निष्ठापूर्वक पूजा करने से भक्तों को अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं। यह देवी तपस्या, वैराग्य और संयम की अधिष्ठात्री हैं, अतः इनकी उपासना से व्यक्ति के भीतर अनुशासन, आत्मसंयम और दृढ़ संकल्प का विकास होता है। माँ की कृपा से मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है, जो विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और साधकों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। यह उन्हें अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें प्राप्त करने में सहायता करती है।
उनकी आराधना से व्यक्ति में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। सांसारिक मोहमाया और विकारों जैसे काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह से मुक्ति मिलती है, जिससे व्यक्ति आंतरिक शांति और संतुष्टि का अनुभव करता है। यह देवी इच्छाशक्ति को प्रबल करती हैं और लक्ष्य प्राप्ति में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्रदान करती हैं। जो भक्त माँ ब्रह्मचारिणी की सच्ची लगन से पूजा करते हैं, वे जीवन की चुनौतियों का सामना धैर्य और साहस के साथ कर पाते हैं, किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते।
रोगों से मुक्ति, भय का नाश और शत्रुओं पर विजय भी माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा के प्रमुख लाभों में से एक है। वे भक्तों को दीर्घायु और निरोगी काया का आशीर्वाद देती हैं, जिससे वे स्वस्थ और सुखी जीवन व्यतीत कर सकें। इसके अतिरिक्त, माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से व्यक्ति में त्याग, तपस्या और वैराग्य के गुण विकसित होते हैं, जो उसे मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं और उसे परम सत्य का बोध कराते हैं। उनकी पूजा से व्यक्ति को भौतिक सुखों के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है, जिससे उसका जीवन सफल और सार्थक बन जाता है। माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना करने वाला भक्त जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सम्मान प्राप्त करता है, और अंततः परमानंद की प्राप्ति करता है। इस प्रकार, माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा न केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करती है, बल्कि आत्मिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
नियम और सावधानियाँ
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके और कोई त्रुटि न हो, जिससे देवी रुष्ट न हों।
1. पवित्रता: शारीरिक और मानसिक पवित्रता सर्वोपरि है। पूजा से पूर्व शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन में किसी भी प्रकार के दुर्विचार, ईर्ष्या या द्वेष न लाएं। पूर्ण श्रद्धा और सकारात्मक भाव से पूजा करें।
2. सात्विकता: पूजा के दौरान और व्रत के दिनों में सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन कदापि न करें, क्योंकि ये तामसिक भोजन माने जाते हैं। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और सात्विक अनाज का ही सेवन करें।
3. ब्रह्मचर्य का पालन: इस दिन, विशेषकर व्रत रखने वाले भक्तों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यह माँ ब्रह्मचारिणी के स्वरूप और उनकी तपस्या के प्रति सम्मान व्यक्त करता है और पूजा की पवित्रता को बनाए रखता है।
4. नियमितता और निष्ठा: पूजा नियमित समय पर और पूर्ण निष्ठा के साथ करें। मंत्रों का जाप सही उच्चारण के साथ करें। जल्दबाजी या लापरवाही से पूजा न करें। यदि संभव हो तो पूजा के समय मौन धारण करें।
5. सावधानी से भोग: माँ को भोग में चीनी, मिश्री या सफेद मिठाई ही अर्पित करें। लाल रंग की वस्तुएं (जैसे लाल वस्त्र, लाल फूल) माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा में प्रयोग न करें, क्योंकि यह माँ काली या माँ रक्तदंतिका को प्रिय हैं। माँ ब्रह्मचारिणी को श्वेत वस्तुएँ ही पसंद हैं।
6. झूठ और क्रोध से बचें: पूजा के दिनों में झूठ बोलने, क्रोध करने, या किसी का अनादर करने से बचें। अपनी वाणी और व्यवहार पर संयम रखें। किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाएँ।
7. दीपक और अग्नि: घी का दीपक प्रज्ज्वलित करते समय विशेष सावधानी बरतें, ताकि कोई दुर्घटना न हो। दीपक को निरंतर प्रज्ज्वलित रखने का प्रयास करें।
8. साफ-सफाई: पूजा स्थल को हमेशा साफ-सुथरा रखें। पूजा सामग्री और उपकरणों को भी स्वच्छ रखें। अशुद्ध स्थान पर पूजा करने से पूजा का फल नहीं मिलता।
इन नियमों का पालन करने से माँ ब्रह्मचारिणी शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी असीम कृपा बरसाती हैं, जिससे उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-शांति का वास होता है।
निष्कर्ष
नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पावन पूजा का दिन है, जो हमें जीवन में तपस्या, संयम और दृढ़ संकल्प के महत्व का स्मरण कराता है। उनकी कठोर तपस्या की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और अटूट श्रद्धा से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो। यह कथा हमें प्रेरणा देती है कि जीवन की यात्रा में आने वाली बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि दृढ़ता और धैर्य के साथ उनका सामना करना चाहिए। माँ ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप हमें सांसारिक मोहमाया से ऊपर उठकर आत्म-कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उनकी आराधना से मन को शांति, शक्ति और एकाग्रता प्राप्त होती है, जिससे हम जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास और धैर्य के साथ कर पाते हैं।
यह केवल एक पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को जगाने का, अपनी इच्छाशक्ति को प्रबल करने का, और आध्यात्मिक अनुशासन को आत्मसात करने का महापर्व है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से ही हम अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं और एक शुद्ध, सात्विक जीवन जी सकते हैं। आइए, इस नवरात्रि के दूसरे दिन, माँ ब्रह्मचारिणी के चरणों में अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें और उनसे प्रार्थना करें कि वे हमें भी तपस्या, संयम और वैराग्य के गुणों से सुशोभित करें, ताकि हम भी अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे और हमारा जीवन सुखमय, शांत और सफल हो। जय माँ ब्रह्मचारिणी! उनका आशीर्वाद हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए और हमें अमरत्व प्रदान करे।

