तुलसी विवाह की प्रक्रिया
**प्रस्तावना**
सनातन धर्म में तुलसी विवाह का पर्व अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप और देवी तुलसी के दिव्य मिलन का उत्सव है, जो प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस अलौकिक विवाह की प्रक्रिया मात्र एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष के शाश्वत संबंध का प्रतीक है, जो सृष्टि में संतुलन और harmony स्थापित करता है। यह पर्व भक्तों के हृदय में भक्ति, श्रद्धा और प्रेम की ऐसी ज्योति प्रज्वलित करता है, जिससे उनके जीवन में सुख-समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। तुलसी, जिसे ‘हरिप्रिया’ भी कहा जाता है, भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं और उनके बिना किसी भी पूजा को अधूरा माना जाता है। तुलसी विवाह की यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी इसका गहरा प्रभाव है, क्योंकि यह परिवारों को एक साथ लाती है और सामूहिक रूप से ईश्वर की आराधना का अवसर प्रदान करती है। इस दिव्य विवाह के पीछे छिपी कथाएँ, इसकी विधि और इससे प्राप्त होने वाले लाभ, सभी हमें आध्यात्मिकता के गहरे आयामों से जोड़ते हैं। आइए, इस पवित्र प्रक्रिया के प्रत्येक चरण को विस्तार से समझते हुए इसके आध्यात्मिक सार को आत्मसात करें।
**पावन कथा**
तुलसी विवाह की पावन कथा वृन्दा और जालंधर की अमर प्रेमगाथा से आरंभ होती है, जो अंततः भगवान विष्णु के साथ तुलसी के दिव्य विवाह के रूप में परिणत हुई। प्राचीन काल में, एक अत्यंत पराक्रमी और अहंकारी असुर हुआ, जिसका नाम जालंधर था। वह समुद्र से उत्पन्न हुआ था और भगवान शिव का अंश माना जाता था। जालंधर की पत्नी वृन्दा, एक परम पतिव्रता स्त्री थी। उसके सतीत्व और तपस्या के बल पर जालंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था, यहाँ तक कि देवता भी उससे भयभीत रहते थे। जालंधर ने अपने बल पर स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित कर दिया। सभी देवता अत्यंत चिंतित होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे जालंधर के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने देखा कि जालंधर को पराजित करना असंभव है, क्योंकि वृन्दा का पातिव्रत्य उसके लिए एक अभेद्य कवच बना हुआ था। तब भगवान विष्णु ने एक युक्ति सोची। उन्होंने जालंधर का रूप धारण किया और वृन्दा के समक्ष प्रकट हुए। वृन्दा ने उन्हें अपने पति समझा और उनके चरण स्पर्श किए। जैसे ही वृन्दा ने पर-पुरुष के चरण स्पर्श किए, उनका पातिव्रत्य भंग हो गया। वृन्दा का पातिव्रत्य भंग होते ही, जालंधर की सारी शक्ति क्षीण हो गई और भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया।
जब वृन्दा को इस छल का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुई। उसने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया और कहा कि जैसे आपने मुझे मेरे पति से विमुख किया है, वैसे ही आपको भी अपनी पत्नी से विमुख होना पड़ेगा। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु ने शालिग्राम का रूप धारण किया। वृन्दा अपने पति के वियोग में जलकर सती हो गईं। जहां वृन्दा सती हुईं, वहां एक पवित्र पौधा उगा, जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया। भगवान विष्णु ने वृन्दा के त्याग और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि तुम मेरे लिए अत्यंत प्रिय होगी और मेरी पूजा तुम्हारे बिना अधूरी मानी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि तुम सदा मेरे साथ रहोगी और कार्तिक मास की एकादशी तिथि को मैं तुम्हारे साथ विवाह करूँगा। तभी से, कार्तिक मास की एकादशी को तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है, जहाँ भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह देवी तुलसी के साथ विधि-विधान से संपन्न होता है। यह कथा हमें यह सिखाती है कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए ईश्वर किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और सच्ची निष्ठा और प्रेम का अंततः सम्मान होता है। वृन्दा की तपस्या और उनके बलिदान ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया और वे जगत में पूजनीय हो गईं। यह विवाह न केवल एक पौराणिक घटना है, बल्कि यह प्रकृति, पुरुष और भक्ति के शाश्वत संबंध का एक अद्भुत प्रतीक है।
**दोहा**
तुलसी हरि को अति प्रिय, शालिग्राम संग ब्याह।
जो पूजे यह पावन पर्व, मिटें सकल संताप।।
**चौपाई**
जय जय तुलसी माता जग तारिणी,
विष्णुप्रिया तुम पावन सुखकारिणी।
कार्तिक मास एकादशी पावन,
शालिग्राम संग मंगल गावन।
कन्यादान सम फल मिल जावे,
जो नर यह व्रत मन से ध्यावे।
वृन्दा रूप तुम जगत उजागर,
भवसागर से पार लगावे।
**पाठ करने की विधि**
तुलसी विवाह की प्रक्रिया अत्यंत विस्तृत और श्रद्धापूर्ण होती है, जिसे विधि-विधान से संपन्न करना आवश्यक है। यह प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी की जाती है:
1. **तैयारी और मंडप स्थापना:** विवाह से पूर्व घर की साफ-सफाई करें और स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। एक छोटे मंडप की स्थापना की जाती है, जिसे गन्ने के डंडों से सजाया जाता है। तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह लाल चुनरी, सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियाँ और अन्य सुहाग की सामग्री से सजाया जाता है। शालिग्राम भगवान को दूल्हे के रूप में पीत वस्त्र और माला पहनाई जाती है।
2. **कलश स्थापना और गणेश पूजन:** सर्वप्रथम पूजा स्थल पर एक कलश स्थापित किया जाता है, जिसमें जल भरकर आम्र पल्लव और नारियल रखा जाता है। गणेश जी का आवाहन कर उनकी पूजा की जाती है ताकि सभी विघ्न दूर हों।
3. **संकल्प:** यजमान या पूजा करने वाला व्यक्ति हाथ में जल, चावल और फूल लेकर तुलसी विवाह संपन्न करने का संकल्प लेता है, जिसमें अपने गोत्र, नाम और विवाह के उद्देश्य का उल्लेख किया जाता है।
4. **शालिग्राम और तुलसी का आवाहन:** भगवान शालिग्राम और देवी तुलसी का आवाहन किया जाता है। उन्हें आसन ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया जाता है।
5. **विवाह की रस्में:**
* **जल अर्पण:** सर्वप्रथम तुलसी और शालिग्राम जी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराया जाता है।
* **वस्त्र और आभूषण:** उन्हें नए वस्त्र और आभूषण अर्पित किए जाते हैं। तुलसी को चुनरी, मंगलसूत्र और बिंदी लगाई जाती है।
* **पुष्प और माला:** सुगंधित पुष्प, तुलसी पत्र (शालिग्राम को), और पुष्पमालाएँ अर्पित की जाती हैं।
* **भोग:** ऋतु फल, मिठाई, पंजीरी और विशेष रूप से तैयार किए गए पकवानों का भोग लगाया जाता है।
* **मंगल गीत और मंत्रोच्चार:** विवाह के दौरान वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और महिलाएं पारंपरिक विवाह गीत गाती हैं।
* **कन्यादान:** तुलसी के पौधे को एक चौकी पर रखकर, उसके चारों ओर परिक्रमा की जाती है और इसे शालिग्राम जी को ‘कन्यादान’ के रूप में अर्पित किया जाता है। यह कन्यादान वास्तविक कन्यादान के समान ही पुण्यदायी माना जाता है।
* **फेरे:** प्रतीकात्मक रूप से तुलसी के पौधे और शालिग्राम जी के सात फेरे लिए जाते हैं। कई स्थानों पर शालिग्राम जी को हाथ में लेकर तुलसी के पौधे की सात बार परिक्रमा की जाती है।
* **मंगलसूत्र धारण:** शालिग्राम जी की ओर से तुलसी जी को मंगलसूत्र पहनाया जाता है।
* **सिंदूर दान:** शालिग्राम जी की ओर से तुलसी जी को सिंदूर अर्पित किया जाता है।
* **हवन:** कुछ स्थानों पर तुलसी विवाह के दौरान संक्षिप्त हवन भी किया जाता है, जिसमें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए आहुतियाँ दी जाती हैं।
6. **आरती:** विवाह की समस्त प्रक्रिया संपन्न होने के बाद, भगवान शालिग्राम और तुलसी माता की श्रद्धापूर्वक आरती की जाती है। कपूर जलाकर उनकी स्तुति की जाती है और संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बनाया जाता है।
7. **प्रसाद वितरण:** आरती के बाद उपस्थित सभी भक्तों और परिवार के सदस्यों को प्रसाद वितरित किया जाता है।
8. **विसर्जन और प्रार्थना:** पूजा के अंत में भगवान से जाने-अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना की जाती है और सुख-शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। यह प्रक्रिया न केवल एक अनुष्ठान है, बल्कि यह जीवन में नए उत्साह और सकारात्मकता का संचार करती है।
**पाठ के लाभ**
तुलसी विवाह की पावन प्रक्रिया का पालन करने से असंख्य आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं, जो भक्त के जीवन को आनंद और समृद्धि से भर देते हैं:
1. **पुण्य फल की प्राप्ति:** मान्यता है कि तुलसी विवाह संपन्न कराने से व्यक्ति को कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है, जो महानतम दानों में से एक माना गया है। इससे व्यक्ति के कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
2. **वैवाहिक सुख:** जिन दंपत्तियों के जीवन में वैवाहिक समस्याओं या कलह का सामना करना पड़ रहा हो, उनके लिए तुलसी विवाह अत्यंत शुभ होता है। यह वैवाहिक संबंधों में मधुरता और सामंजस्य स्थापित करता है।
3. **शीघ्र विवाह:** अविवाहित युवक-युवतियों द्वारा यह अनुष्ठान करने से उनके विवाह में आ रही बाधाएँ दूर होती हैं और उन्हें योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
4. **संतान सुख:** जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में कठिनाई हो रही हो, उन्हें तुलसी विवाह का अनुष्ठान करने से भगवान विष्णु और तुलसी माता के आशीर्वाद से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
5. **मोक्ष और मुक्ति:** तुलसी को मोक्ष प्रदायिनी कहा गया है। तुलसी विवाह का आयोजन करने और इसमें सम्मिलित होने से व्यक्ति को जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और उसे परम धाम की प्राप्ति होती है।
6. **धन-धान्य और समृद्धि:** भगवान विष्णु जगत के पालनहार हैं और देवी लक्ष्मी उनकी सहधर्मिणी हैं। तुलसी विवाह संपन्न कराने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, जिससे देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न होकर भक्तों को धन, धान्य और ऐश्वर्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। घर में सुख-शांति बनी रहती है।
7. **रोगों से मुक्ति:** तुलसी का औषधीय महत्व भी है। धार्मिक रूप से मान्यता है कि तुलसी विवाह का पूजन करने से घर-परिवार में आरोग्य बना रहता है और रोगों से मुक्ति मिलती है।
8. **ग्रह दोषों का शमन:** ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, तुलसी विवाह का अनुष्ठान विभिन्न ग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों को शांत करने में सहायक होता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जिनकी कुंडली में विवाह संबंधी दोष हों।
9. **नकारात्मक ऊर्जा का नाश:** इस पवित्र अनुष्ठान से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं, जिससे घर का वातावरण शुद्ध और पवित्र बना रहता है।
10. **भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि:** यह पर्व भक्तों को भगवान विष्णु और देवी तुलसी के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को गहरा करने का अवसर प्रदान करता है। यह आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है और मन को शांति प्रदान करता है।
इस प्रकार, तुलसी विवाह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन सुधारक अनुष्ठान है जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक हर स्तर पर भक्तों को लाभान्वित करता है।
**नियम और सावधानियाँ**
तुलसी विवाह एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है, और इसके पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अनिवार्य है:
1. **पवित्रता और स्वच्छता:** पूजा स्थल और पूजा सामग्री की पवित्रता बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूजा से पूर्व स्वयं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तुलसी के पौधे के आसपास भी पूर्ण स्वच्छता रखें।
2. **शुभ मुहूर्त:** तुलसी विवाह के लिए निर्धारित शुभ मुहूर्त का पालन करना चाहिए। आमतौर पर यह कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) को संपन्न किया जाता है। शुभ मुहूर्त में की गई पूजा अधिक फलदायी होती है।
3. **तुलसी की देखभाल:** तुलसी के पौधे का विशेष ध्यान रखें। यह पौधा हरा-भरा और स्वस्थ होना चाहिए। मुरझाया हुआ या क्षतिग्रस्त पौधा पूजा के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।
4. **निराहार व्रत:** तुलसी विवाह करने वाले व्यक्ति को एकादशी के दिन निराहार व्रत रखना चाहिए या फलाहार ग्रहण करना चाहिए।
5. **सात्विक वातावरण:** पूजा के दौरान घर में सात्विक वातावरण बनाए रखें। मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का सेवन वर्जित होता है। क्रोध, लोभ, मोह जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहें।
6. **यथाशक्ति दान:** विवाह के उपरांत यथाशक्ति दान-पुण्य अवश्य करें। ब्राह्मणों को भोजन कराना या उन्हें वस्त्र, धन आदि दान करना शुभ माना जाता है।
7. **तुलसी तोड़ने से बचें:** एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। यदि पूजा के लिए तुलसी दल की आवश्यकता हो, तो उसे एक दिन पूर्व ही तोड़ लेना चाहिए।
8. **पूजन सामग्री की शुद्धता:** सभी पूजन सामग्री जैसे फूल, फल, वस्त्र, प्रसाद आदि शुद्ध और ताजे होने चाहिए। बासी सामग्री का उपयोग न करें।
9. **समर्पण और श्रद्धा:** सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि यह अनुष्ठान पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और समर्पण भाव से किया जाना चाहिए। केवल विधि-विधान का पालन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि हृदय से ईश्वर के प्रति आस्था होनी चाहिए।
10. **विवाह से संबंधित परंपराओं का पालन:** विवाह के समय किए जाने वाले पारंपरिक रीति-रिवाजों जैसे मंगलगीत, कन्यादान और फेरे को पूरे सम्मान के साथ संपन्न करें।
11. **अशुभ विचार त्यागें:** पूजा के समय मन को शांत और एकाग्र रखें। किसी भी प्रकार के अशुभ या नकारात्मक विचारों को मन में न आने दें।
इन नियमों और सावधानियों का पालन करते हुए तुलसी विवाह संपन्न करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु और तुलसी माता का असीम आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
**निष्कर्ष**
तुलसी विवाह की यह पावन प्रक्रिया केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और परमात्मा के दिव्य मिलन का एक शाश्वत प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक साधारण पौधा अपनी अनन्य भक्ति और पवित्रता के कारण स्वयं भगवान विष्णु की प्रिय बन गया और पूज्यनीय स्थान प्राप्त किया। वृन्दा की त्याग और निष्ठा की गाथा हमें यह संदेश देती है कि सच्ची श्रद्धा और पतिव्रत धर्म से बढ़कर कोई शक्ति नहीं। इस विवाह के माध्यम से हम न केवल भगवान शालिग्राम और तुलसी माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, बल्कि अपने जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। यह पर्व हमें परिवार के साथ मिलकर एक सामूहिक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर देता है, जहाँ हर एक विधि, हर एक मंत्र और हर एक अर्पण हमारे हृदय को दिव्यता से भर देता है। जब हम तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाते हैं और शालिग्राम भगवान के साथ उसका विवाह संपन्न कराते हैं, तो हम वास्तव में अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं। यह एक ऐसा आध्यात्मिक उत्सव है जो अंधकार को मिटाकर प्रकाश लाता है, निराशा को हटाकर आशा का संचार करता है, और हर घर को प्रेम और भक्ति के रंग से रंग देता है। आइए, इस अनुपम पर्व को पूरे हृदय से मनाएँ और तुलसी माता तथा भगवान विष्णु के चरणों में अपना शीश झुकाकर जीवन की हर बाधा को पार करने का आशीर्वाद प्राप्त करें। यह विवाह हमें यह याद दिलाता है कि धर्म का पालन ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और सच्ची भक्ति से ही परम सुख की प्राप्ति संभव है। तुलसी विवाह की यह परंपरा युगों-युगों तक हमारे घरों को पवित्रता और खुशियों से भरती रहे।

