जन्माष्टमी: प्रेम, आनंद और धर्म की स्थापना का महापर्व
समस्त सनातन संस्कृति में, कुछ पर्व ऐसे होते हैं जो केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का सार और प्रेरणा बन जाते हैं। ऐसा ही एक पावन पर्व है ‘जन्माष्टमी’, जो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक बालक के जन्म का नहीं, बल्कि धरती पर धर्म की पुनः स्थापना, अधर्म के नाश और प्रेम व आनंद के शाश्वत संदेश के अवतरण का प्रतीक है।
आइए, इस शुभ अवसर पर हम उस अद्भुत लीला को याद करें, जिसने न केवल इतिहास रचा, बल्कि युगों-युगों तक मानव जाति को प्रेरणा दी।
कंस का आतंक और आकाशवाणी
बहुत समय पहले, मथुरा नगरी में कंस नामक एक क्रूर राजा का शासन था। उसने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर स्वयं राजपाट हथिया लिया था। कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था। जब देवकी का विवाह हुआ, तब एक आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही कंस का वध करेगा। यह सुनकर कंस भयभीत हो गया और उसने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया।
श्री कृष्ण का दिव्य अवतरण
कंस ने देवकी के छह पुत्रों को निर्दयतापूर्वक मार डाला। सातवें गर्भ में बलराम जी थे, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। जब देवकी का आठवाँ गर्भ था, तो कंस की क्रूरता चरम पर थी। आधी रात का समय था, भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी, रोहिणी नक्षत्र था और चंद्रमा अपने चरम पर था। तभी कारागार के अंधकार में एक दिव्य प्रकाश फैला और भगवान विष्णु स्वयं चतुर्भुज रूप में देवकी-वसुदेव के सामने प्रकट हुए।
भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और बताया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए हैं। उन्होंने वसुदेव को आदेश दिया कि वे उन्हें गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के पास छोड़ आएं।
नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!
भगवान के आदेश पर, कारागार के द्वार अपने आप खुल गए और सभी पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव जी अपने बाल-गोपाल को एक टोकरी में रखकर घनघोर वर्षा और तूफान के बीच यमुना नदी पार करने निकल पड़े। यमुना नदी भी भगवान के चरणों को छूने के लिए उफन उठी, तब शेषनाग ने अपने फन से वासुदेव और बालक कृष्ण को वर्षा से बचाया।
गोकुल पहुँचकर, वसुदेव जी ने बालक कृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस मथुरा आ गए। कंस को जब देवकी के आठवें पुत्र के जन्म की खबर मिली, तो वह तुरंत कारागार पहुँचा, लेकिन वहाँ उसने एक कन्या को पाया। कंस ने जैसे ही उस कन्या को मारने का प्रयास किया, वह आकाश में उड़ गई और योगमाया के रूप में प्रकट होकर बोली, “रे मूर्ख! तेरा वध करने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”
जन्माष्टमी का महत्व
जन्माष्टमी का पर्व हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
- अधर्म पर धर्म की विजय: यह हमें सिखाता है कि कितनी भी बुरी शक्तियाँ क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की ही जीत होती है।
- ईश्वरीय हस्तक्षेप: भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए समय-समय पर अवतरित होते हैं।
- प्रेम और आनंद: श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, शरारत और आनंद से भरा है। यह पर्व हमें जीवन में हर्ष और उल्लास को अपनाने की प्रेरणा देता है।
- कर्मयोग का संदेश: भविष्य में, श्री कृष्ण ने ही भगवद गीता के माध्यम से कर्मयोग का महान संदेश दिया।
कैसे मनाएं यह पावन पर्व?
जन्माष्टमी का पर्व पूरे भारत और विदेशों में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भक्तजन इस दिन:
- व्रत और उपवास: कई भक्त निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म के बाद ही व्रत तोड़ते हैं।
- पूजा और अभिषेक: मंदिरों और घरों में भगवान कृष्ण की प्रतिमा या बाल गोपाल का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से अभिषेक किया जाता है।
- भजन-कीर्तन: भक्तजन रात भर भगवान कृष्ण के भजन गाते हैं और उनकी लीलाओं का स्मरण करते हैं।
- पालना सजाना: बाल गोपाल के लिए सुंदर पालना सजाया जाता है और उन्हें उसमें झुलाया जाता है।
- झाँकियाँ और रासलीला: कई स्थानों पर भगवान कृष्ण के जीवन से संबंधित झाँकियाँ निकाली जाती हैं और रासलीला का आयोजन होता है।
- दही हांडी: महाराष्ट्र में यह परंपरा ‘दही हांडी’ के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ युवा पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बंधी मटकी को तोड़ते हैं।
अंतिम विचार
जन्माष्टमी हमें याद दिलाती है कि जब भी धर्म का क्षय होता है और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में प्रकट होकर बुराई का नाश करते हैं। यह पर्व हमें श्री कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेने, भक्ति मार्ग पर चलने और प्रेम व शांति का संदेश फैलाने के लिए प्रेरित करता है।
इस पावन पर्व पर, सनातन स्वर की ओर से आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! जय श्री कृष्ण!

