गोवर्धन पर्वत लीला: श्री कृष्ण ने क्यों उठाया यह पर्वत? जानें भक्ति और शरणागति का रहस्य
सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण की लीलाएँ अनगिनत हैं, जिनमें से हर लीला कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपाए हुए है। ऐसी ही एक अद्भुत और प्रेरणादायक लीला है – गोवर्धन पर्वत धारण करने की। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भक्ति, शरणागति और अहंकार पर विजय की अमर गाथा है। आइए, जानते हैं ब्रज की इस महिमामयी कथा को, जो आज भी हर भक्त के हृदय में श्रद्धा का संचार करती है।
ब्रज में इंद्र पूजा की परंपरा और नन्हें कृष्ण का प्रश्न
द्वापर युग की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण बाल्यावस्था में ब्रज में निवास कर रहे थे। उस समय ब्रजवासी प्रतिवर्ष देवराज इंद्र की पूजा करते थे, ताकि इंद्र प्रसन्न होकर अच्छी वर्षा करें और उनकी गायों तथा खेती को लाभ हो। एक दिन नन्हें कृष्ण ने अपने पिता नंदबाबा और अन्य ब्रजवासियों से पूछा कि वे किसकी पूजा कर रहे हैं और क्यों?
नंदबाबा ने बताया कि वे इंद्र देव की पूजा कर रहे हैं, जो वर्षा के देवता हैं और उनकी कृपा से ही अन्न तथा जल प्राप्त होता है। कान्हा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पिताजी! हमें तो उस पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जो हमें फल, फूल, औषधि, जल और अपनी हरी-भरी घास से हमारी गायों को पोषण देता है। इंद्र तो बस घमंड में हैं। असली देवता तो प्रकृति है और इस गोवर्धन पर्वत में ही हमें साक्षात ईश्वर का रूप देखना चाहिए।”
श्री कृष्ण का सुझाव और गोवर्धन पूजा का आरंभ
कान्हा के तर्कों से प्रभावित होकर ब्रजवासियों ने इस वर्ष इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत और अपनी गायों की पूजा करने का निर्णय लिया। उन्होंने नाना प्रकार के पकवान (अन्नकूट) बनाए, जिनकी संख्या 56 थी, और गोवर्धन पर्वत की भव्य पूजा-अर्चना की। श्री कृष्ण ने स्वयं एक विराट रूप धारण कर गोवर्धन पर्वत पर प्रकट होकर ब्रजवासियों का प्रसाद ग्रहण किया, जिससे सभी को विश्वास हो गया कि गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान का ही स्वरूप है।
इंद्र का क्रोध और मूसलाधार वर्षा
जब देवराज इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की है, तो उनका अहंकार आहत हुआ। वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और अपने मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज में इतनी वर्षा करें कि पूरा ब्रज डूब जाए और कृष्ण के साथ-साथ सभी ब्रजवासी नष्ट हो जाएँ।
इंद्र के क्रोध से भयंकर मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। देखते ही देखते चारों ओर जल-प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। ब्रजवासी भयभीत होकर श्री कृष्ण की शरण में पहुँचे और उनसे रक्षा की गुहार लगाई।
गोवर्धन धारण लीला: श्री कृष्ण ने उठाया पर्वत
अपने भक्तों को संकट में देखकर श्री कृष्ण ने तुरंत अपनी लीला का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठा) पर पूरे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। फिर उन्होंने सभी ब्रजवासियों को अपनी गायों और सामान सहित गोवर्धन पर्वत के नीचे आकर शरण लेने के लिए कहा।
सात दिनों तक लगातार इंद्र ने अपनी पूरी शक्ति से वर्षा की, लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर धारण करके सभी ब्रजवासियों की रक्षा की। ब्रजवासी पर्वत के नीचे सुरक्षित रहकर कृष्ण के चमत्कार का अनुभव करते रहे।
इंद्र का अभिमान भंग और देवों द्वारा स्तुति
आठवें दिन, जब इंद्र ने देखा कि उनकी सारी शक्ति व्यर्थ हो गई है और कृष्ण ने ब्रजवासियों को बचा लिया है, तो उनका अभिमान टूट गया। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। वे ब्रह्माजी और कामधेनु गाय के साथ श्री कृष्ण के पास आए और उनसे क्षमा याचना की। इंद्र ने श्री कृष्ण की महिमा को स्वीकार किया और उनकी भक्ति में लीन हो गए। इस प्रकार, श्री कृष्ण ने इंद्र के अहंकार को भंग किया और गोवर्धन पूजा की महत्ता स्थापित की।
गोवर्धन लीला से मिलने वाली शिक्षाएँ
गोवर्धन पर्वत धारण करने की यह अद्भुत लीला हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देती है:
- अहंकार का त्याग: इंद्र का अभिमान चूर-चूर हुआ, जो हमें सिखाता है कि किसी भी प्रकार का घमंड विनाश का कारण बनता है।
- भक्ति की शक्ति: यह लीला बताती है कि यदि भक्त पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान की शरण में आता है, तो भगवान उसकी हर संकट से रक्षा करते हैं।
- प्रकृति का सम्मान: कृष्ण ने गोवर्धन पूजा का प्रस्ताव देकर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का महत्व समझाया।
- शरणాగति का महत्व: ब्रजवासियों ने जब पूर्ण रूप से कृष्ण की शरण ली, तो वे सभी संकटों से पार पा गए। यह हमें भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की प्रेरणा देता है।
- नेतृत्व और कर्तव्य: श्री कृष्ण ने एक छोटे बालक के रूप में भी अपने समाज की रक्षा के लिए नेतृत्व किया और अपने कर्तव्य का पालन किया।
निष्कर्ष: भक्ति मार्ग का शाश्वत संदेश
गोवर्धन पर्वत लीला केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि भक्ति मार्ग का एक शाश्वत संदेश है। यह हमें सिखाती है कि हमें अपने अहंकार को त्याग कर, प्रकृति का सम्मान करते हुए और पूर्ण श्रद्धा के साथ ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण हमें यह भी बताते हैं कि वे सदैव अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिए, आइए हम भी अपने जीवन में सच्ची भक्ति और शरणागति को अपनाकर आनंद और शांति प्राप्त करें।

