गणेश चतुर्थी: आस्था और आनंद का संगम
भारतवर्ष में अनेकों पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हर्षोल्लास भरा त्योहार है – गणेश चतुर्थी। यह पावन पर्व भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ होकर अनंत चतुर्दशी तक चलता है। इस दौरान भक्तगण अपने घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं, उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं और मोदक जैसे प्रिय व्यंजनों का भोग लगाते हैं।
भगवान गणेश को ‘विघ्नहर्ता’ और ‘बुद्धि के देवता’ के रूप में पूजा जाता है। उनकी पूजा से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और ज्ञान तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है। आइए, इस पावन अवसर पर उनकी अद्भुत जन्म कथा और इस पर्व के महत्व को विस्तार से जानें।
विघ्नहर्ता गणेश की अद्भुत जन्म कथा
भगवान गणेश की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। यह कथा भगवान शिव, माता पार्वती और समस्त देवलोक के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।
माता पार्वती का संकल्प
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं। उन्होंने देखा कि उनके पास अपने कक्ष की रक्षा के लिए कोई द्वारपाल नहीं है। तब उन्होंने अपने शरीर के मैल और चंदन के लेप से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूँक दिए। इस प्रकार भगवान गणेश का जन्म हुआ। माता पार्वती ने उस बालक को आदेश दिया कि कोई भी उनकी अनुमति के बिना कक्ष में प्रवेश न करे।
शिव जी का आगमन और गणेश का शीशच्छेदन
कुछ समय पश्चात् भगवान शिव वहाँ आए और भीतर प्रवेश करने का प्रयास किया। बालक गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया, क्योंकि माता पार्वती का स्पष्ट आदेश था। शिव जी ने बालक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन गणेश अपनी माता के आदेश पर अडिग रहे। क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
गजमुख गणपति का पुनर्जन्म
जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हुईं। उन्होंने शिव जी से गणेश को पुनः जीवित करने का आग्रह किया। शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएं और जो भी पहला जीवित प्राणी मिले, उसका मस्तक लेकर आएं। गणों को एक हाथी का बच्चा मिला, जिसका मस्तक वे ले आए। भगवान शिव ने उस हाथी के मस्तक को गणेश के धड़ से जोड़ा और उन्हें पुनः जीवित किया। इस प्रकार, भगवान गणेश ‘गजमुख गणपति’ कहलाए और उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होने का वरदान मिला।
गणेश चतुर्थी का महत्व और पूजन विधि
गणेश चतुर्थी का पर्व हमें सिखाता है कि कर्तव्य और भक्ति का पालन कितने दृढ़ता से करना चाहिए। भगवान गणेश की कथा हमें यह भी बताती है कि क्रोध के बजाय धैर्य और समझदारी से काम लेना चाहिए।
पूजन विधि के मुख्य चरण:
- स्थापना: चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
- पूजन: इसके पश्चात् उन्हें स्नान कराकर वस्त्र पहनाए जाते हैं। दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर, अक्षत और मोदक विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं।
- आरती: दीपक जलाकर भगवान गणेश की आरती की जाती है, जिसमें "जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा…" आरती प्रमुख है।
- भोग: भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्हें मोदक, लड्डू और अन्य मीठे व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
- विसर्जन: दस दिनों तक पूजा के पश्चात्, अनंत चतुर्दशी के दिन भक्तगण ढोल-नगाड़ों के साथ गणपति बप्पा को विदाई देते हुए उनकी प्रतिमा का जल में विसर्जन करते हैं, इस विश्वास के साथ कि वे अगले वर्ष फिर आएंगे।
एक संदेश: भक्ति और समर्पण का पर्व
गणेश चतुर्थी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और आत्म-शुद्धि का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि कैसे जीवन की बाधाओं को दूर कर ज्ञान और बुद्धि के मार्ग पर चलना चाहिए। भगवान गणेश की कृपा से हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। आइए, इस पावन पर्व को सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाएं और विघ्नहर्ता का आशीर्वाद प्राप्त करें।

