गजेन्द्र मोक्ष: जब भगवान ने गजराज की पुकार सुनी और संकटों का नाश किया
सनातन धर्म में अनेक ऐसी कथाएँ हैं जो यह बताती हैं कि जब भक्त सच्चे हृदय से भगवान को पुकारता है, तो परमेश्वर उसकी सहायता के लिए तुरंत प्रकट होते हैं। ऐसी ही एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कथा है ‘गजेन्द्र मोक्ष’ की, जो भागवत पुराण में वर्णित है। यह कथा न केवल गजराज की अटूट भक्ति और उसकी मुक्ति की कहानी है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि जीवन के सबसे बड़े संकट में भी ईश्वर पर विश्वास और पूर्ण समर्पण हमें हर विपदा से उबार सकता है।
त्रिकूट पर्वत और पुण्य सरोवर की शोभा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में त्रिकूट नामक एक अत्यंत सुंदर पर्वत था। यह पर्वत अपनी अद्भुत छटा और घने वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस पर्वत पर एक विशाल और निर्मल सरोवर था, जिसका जल इतना पवित्र था कि उसमें स्नान करने मात्र से सभी पाप धुल जाते थे। इस सरोवर में कमल के फूल खिले रहते थे और इसकी शोभा देखते ही बनती थी। इसी वन में हाथियों का एक झुंड रहता था, जिसका मुखिया एक बलशाली और धर्मपरायण गजराज था।
गजराज का संकट: ग्राह से युद्ध
एक दिन, भीषण गर्मी से व्याकुल गजराज अपने झुंड के साथ उसी सरोवर में जल पीने और स्नान करने गया। गजराज ने सरोवर के शीतल जल में डुबकी लगाई और अपनी प्यास बुझाई। वह कमल के फूलों को अपनी सूंड से तोड़कर भगवान की स्तुति करना चाहता था। तभी अचानक एक शक्तिशाली ग्राह (मगरमच्छ) ने गजराज का पैर पकड़ लिया। ग्राह इतना बलशाली था कि गजराज अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी अपने पैर को उसके चंगुल से छुड़ा नहीं पा रहा था।
यह युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा। गजराज और ग्राह, दोनों ही अपनी पूरी शक्ति से लड़ते रहे। गजराज के साथी हाथी भी उसकी मदद करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन ग्राह की पकड़ इतनी मजबूत थी कि कोई भी उसे छुड़ा नहीं पाया। धीरे-धीरे गजराज की शक्ति क्षीण होने लगी। उसे यह आभास हो गया कि अब उसकी शारीरिक शक्ति उसे इस संकट से नहीं निकाल सकती। मृत्यु निकट देखकर गजराज निराश हो गया।
अंतिम पुकार: कमल के पुष्प से भगवान को निमंत्रण
जब गजराज ने सभी मानवीय (या गजवीय) प्रयास विफल होते देखे, तो उसने अपने पिछले जन्म के सत्कर्मों और ज्ञान के बल पर यह समझा कि इस संसार में केवल भगवान ही एकमात्र ऐसे हैं जो इस असंभव संकट से उसे बचा सकते हैं। उसने अपनी सूंड में एक कमल का फूल लिया और अत्यंत करुण हृदय से, अश्रुपूरित नेत्रों से आकाश की ओर देखते हुए, आदि नारायण भगवान विष्णु का स्मरण किया। उसने पूर्ण समर्पण भाव से पुकारा:
“सर्वेश्वर, सर्वव्यापी, आदिदेव, मुझे इस संकट से उबारो! मैं तुम्हारी शरण में हूँ।”
यह पुकार इतनी सच्ची और हृदय से निकली थी कि त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु तक पहुँच गई।
भगवान विष्णु का त्वरित आगमन
क्षीरसागर में अपनी शैया पर विराजमान भगवान विष्णु ने जब अपने भक्त गजराज की करुण पुकार सुनी, तो वे क्षण भर भी विलंब न कर सके। उन्होंने गरुड़ को बुलाया और उस पर सवार होकर तत्काल गजराज की सहायता के लिए चल पड़े। भगवान इतनी शीघ्रता में थे कि उन्हें अपनी सभी तैयारी करने का भी समय नहीं मिला; वे शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए ही आ गए। उनके आगमन से त्रिकूट पर्वत पर दिव्य प्रकाश फैल गया।
भगवान विष्णु ने गजराज को ग्राह के चंगुल में फंसा देखा। उन्होंने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया और ग्राह का सिर धड़ से अलग कर दिया।
मोक्ष और पूर्व जन्म का रहस्य
ग्राह के शरीर से एक दिव्य गंधर्व प्रकट हुआ, जिसका नाम ‘हू-हू’ था। उसे ऋषि देवल के श्राप के कारण मगरमच्छ बनना पड़ा था। भगवान के दर्शन से उसे मुक्ति मिली। इसी प्रकार, गजराज भी अपने पूर्व जन्म में ‘इंद्रद्युम्न’ नामक एक महान राजा था, जिसे अगस्त्य मुनि के श्राप के कारण हाथी का जन्म लेना पड़ा था। भगवान विष्णु ने गजराज को भी मोक्ष प्रदान किया और उसे अपने धाम वैकुण्ठ ले गए।
गजेन्द्र मोक्ष का संदेश
यह कथा हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देती है:
- भक्ति की शक्ति: सच्चा भक्त चाहे किसी भी योनि में हो, भगवान उसकी पुकार अवश्य सुनते हैं।
- ईश्वर पर पूर्ण विश्वास: जब सारे सांसारिक उपाय विफल हो जाएँ, तब ईश्वर पर पूर्ण विश्वास ही एकमात्र सहारा होता है।
- शरणागति का महत्व: पूर्ण समर्पण और शरणागति से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
- विपत्ति में स्मरण: संकट के क्षणों में भगवान का स्मरण हमें भय और मृत्यु से मुक्ति दिलाता है।
गजेन्द्र मोक्ष की यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि भगवान श्री हरि अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। आवश्यकता केवल सच्चे मन से उन्हें पुकारने की है। आइए, हम भी अपने जीवन में भक्ति और शरणागति के मार्ग पर चलकर प्रभु की कृपा प्राप्त करें।

