गजेंद्र मोक्ष कथा: जब गजराज की पुकार पर दौड़े चले आए श्री हरि!
हमारे सनातन धर्म में ऐसी अनगिनत कथाएं हैं जो हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची भक्ति और पूर्ण शरणागति से भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी समय प्रकट हो सकते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कथा है ‘गजेंद्र मोक्ष’ की, जो हमें यह बताती है कि भगवान की कृपा पाने के लिए धन, बल या ज्ञान नहीं, बल्कि निष्ठा और प्रेम ही आवश्यक है। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के आठवें स्कंध में वर्णित है, जो हमें जीवन के सबसे बड़े संकट में भी भगवान पर विश्वास रखने की प्रेरणा देती है।
गजेंद्र की विकट विपदा
त्रिकूट पर्वत की सुरम्य घाटियों में एक विशाल सरोवर था, जहाँ गजेंद्र नामक हाथियों का राजा अपने झुंड के साथ रहता था। एक दिन गजेंद्र अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ सरोवर में जलक्रीड़ा करने उतरा। पानी में आनंद लेते हुए, अचानक एक शक्तिशाली मगरमच्छ ने उसके पैर को जकड़ लिया। गजेंद्र अपनी पूरी शक्ति लगाकर मगरमच्छ से जूझने लगा।
हजारों वर्षों का संघर्ष और शरणागति
यह संघर्ष एक-दो दिन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों तक चला। गजेंद्र का बल क्षीण होने लगा और वह असहाय महसूस करने लगा। जब उसने देखा कि उसका अपना बल, उसका परिवार, कोई भी उसे इस संकट से नहीं निकाल सकता, तब उसे अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से भगवान की याद आई। उसने अपने मन में निश्चय किया कि अब केवल त्रिलोकीनाथ ही उसे बचा सकते हैं। उस क्षण, गजराज ने भौतिक जगत के सभी अवलंबों का त्याग कर दिया और अपनी आत्मा को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दिया।
कमल पुष्प और गजेंद्र स्तुति
अपनी सूंड से एक कमल का फूल तोड़कर, गजेंद्र ने उसे ऊपर उठाया और हृदय से भगवान श्री हरि को पुकारा। उसने अपनी सारी आस छोड़कर परमपिता परमात्मा के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया। इसी क्षण गजेंद्र ने प्रसिद्ध ‘गजेंद्र स्तुति’ का पाठ किया, जिसमें उसने भगवान के निराकार और सगुण स्वरूप की वंदना की, और अपनी अज्ञानता व असहायता को स्वीकार करते हुए उनसे रक्षा की प्रार्थना की। उसकी पुकार इतनी तीव्र और सच्ची थी कि सीधे वैकुंठ में भगवान तक जा पहुँची।
भगवान का तत्काल आगमन
अपने भक्त की यह करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु वैकुंठ से तत्काल गरुड़ पर आरूढ़ होकर दौड़े चले आए। उनके शंखनाद से तीनों लोक गूँज उठे। भगवान को आते देख गजेंद्र ने पुनः अपनी सूंड में कमल का फूल लेकर ऊपर उठाया और कहा, “नारायण! हे त्रिभुवन स्वामी! आपकी जय हो!” भगवान ने बिना किसी विलंब के अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का सिर धड़ से अलग कर दिया और गजेंद्र को जीवनदान दिया।
मोक्ष और पूर्व जन्म का रहस्य
यह जानकर और भी आश्चर्य होता है कि मगरमच्छ पूर्व जन्म में ‘हूहू’ नामक गंधर्व था, जिसे ऋषि देवल के श्राप से मगरमच्छ का जन्म मिला था। भगवान के हाथों मृत्यु प्राप्त कर उसे मोक्ष मिला। वहीं, गजेंद्र भी पूर्व जन्म में ‘इंद्रद्युम्न’ नामक एक परम भक्त राजा था, जिसे ऋषि अगस्त्य के श्राप के कारण हाथी का शरीर मिला था। भगवान की कृपा से गजेंद्र को भी मोक्ष प्राप्त हुआ और वह भगवान के धाम चला गया। यह कथा कर्मफल और ईश्वरीय कृपा के गूढ़ रहस्यों को भी उजागर करती है।
गजेंद्र मोक्ष से मिलने वाली सीख
यह पावन कथा हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देती है, जो आज भी हमारे जीवन में प्रासंगिक हैं:
- शरणागति की शक्ति: जब व्यक्ति अपनी समस्त शक्तियों का त्याग कर पूर्णतः ईश्वर की शरण में आ जाता है, तब भगवान उसकी रक्षा अवश्य करते हैं। यह दिखावा नहीं, बल्कि हृदय से किया गया समर्पण होना चाहिए।
- कर्मफल और मोक्ष: यह कथा दर्शाती है कि हमारे कर्मों का फल अवश्य मिलता है, लेकिन भगवान की असीम कृपा से बड़े से बड़े पापों का भी नाश हो सकता है और मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
- भगवान की करुणा: भगवान अपने भक्तों के कष्टों को देखकर तुरंत ही उनकी सहायता के लिए प्रकट होते हैं, चाहे भक्त किसी भी योनि में क्यों न हो। उनकी करुणा असीम है।
- अहंकार का त्याग: गजेंद्र ने अपने शारीरिक बल और राजसी सत्ता का अहंकार छोड़ कर ही भगवान को पुकारा, जो उसके उद्धार का कारण बना। सच्चा भक्त वही है जो अहंकार मुक्त हो।
निष्कर्ष
गजेंद्र मोक्ष की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि जीवन के किसी भी संकट में हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए और अपनी सारी आस छोड़कर भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। भगवान श्री हरि अपने भक्तों की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। आइए, हम भी अपने जीवन में भक्ति और शरणागति के इस मार्ग को अपनाएं और प्रभु की असीम कृपा के पात्र बनें। यह कथा हमें याद दिलाती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों के साथ हैं और उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
जय श्री हरि!

