कर्म की गहराई: ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ भजन का आध्यात्मिक अर्थ और जीवन दर्शन

कर्म की गहराई: ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ भजन का आध्यात्मिक अर्थ और जीवन दर्शन

कर्म की गहराई: ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ भजन का आध्यात्मिक अर्थ और जीवन दर्शन

सनातन धर्म में कर्म के सिद्धांत को जीवन का आधारशिला माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों और संतों ने सदियों से इस सत्य को विभिन्न भजनों, कथाओं और उपदेशों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। ऐसा ही एक मार्मिक और हृदयस्पर्शी भजन है ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, अब अमृत पिलाने से क्या फायदा?’ यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक गहन जीवन दर्शन है, जो हमें हमारे कर्मों के महत्व और निस्वार्थ सेवा के सार से परिचित कराता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में किए गए प्रत्येक कार्य, चाहे वे छोटे हों या बड़े, हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। आइए, ‘सनातन स्वर’ पर आज हम इसी भजन के गूढ़ अर्थ, हिंदू धर्म में कर्म के सिद्धांत, सेवा के महत्व और भक्ति में अच्छे कर्मों की अनिवार्यता पर विस्तार से चर्चा करें।

एक शिक्षाप्रद कथा: धर्मपाल और दयाराम की कहानी

प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मपाल नामक एक अत्यंत धनी व्यक्ति रहता था। उसके पास धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी, बड़े-बड़े महल, स्वर्ण-आभूषण और असंख्य सेवक उसकी सेवा में लीन रहते थे। लेकिन धर्मपाल का स्वभाव उसके धन के विपरीत था। वह अत्यंत स्वार्थी और कृपण था। उसके दरवाजे पर कोई भूखा-प्यासा आता, तो उसे दुत्कार कर भगा दिया जाता। ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ – यह पंक्ति उसके जीवन का कड़वा सत्य थी। उसने कभी किसी को एक बूंद पानी भी नहीं पिलाया, न ही किसी असहाय की मदद की। वह सोचता था कि मेरा धन केवल मेरे सुख के लिए है।

नगर में जब भी कोई अकाल पड़ता या महामारी फैलती, लोग भूख-प्यास से तड़पते, धर्मपाल अपनी हवेली के द्वार बंद कर लेता। वहीं उसके पड़ोसी, एक साधारण सा कुम्हार, जिसका नाम दयाराम था, वह अपनी सीमित आय में से भी लोगों की मदद करता था। वह अपनी झोपड़ी के बाहर एक जल सेवा का घड़ा रखता, ताकि राहगीर अपनी प्यास बुझा सकें। वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर गरीबों के लिए भोजन का प्रबंध करता, चाहे उसे स्वयं भूखा ही क्यों न रहना पड़े। दयाराम की भक्ति केवल मंदिरों में आरती करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह अपने प्रत्येक कर्म में ईश्वर का वास देखता था। वह त्यौहारों पर भी अपनी ओर से यथासंभव दान-पुण्य करता और लोगों की सेवा में लगा रहता था।

समय बीतता गया। धर्मपाल वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ, लेकिन उसके मन का मैल और अहंकार नहीं गया। जीवन के अंतिम क्षणों में उसे गंभीर रोग ने घेर लिया। उसका सारा धन-वैभव भी उसे बचा नहीं सका। वैद्य और हकीम हार मान चुके थे। उसके पुत्रों ने सोचा कि शायद अब अंतिम समय में कुछ दान-पुण्य करने से पिताजी को शांति मिलेगी। उन्होंने गंगाजल मंगवाया, अमृततुल्य औषधियाँ मंगवाईं और धर्मपाल के मुख में डालने का प्रयास किया।

लेकिन धर्मपाल को कुछ भी कंठ से उतर नहीं रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी थी, एक अतृप्त प्यास थी। उसी समय, उसे दयाराम का जल सेवा का घड़ा और उसकी निस्वार्थ सेवा याद आई। उसे वो सभी प्यासे लोग याद आए, जिन्हें उसने जीवन भर दुत्कारा था। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने अपने पुत्रों से कहा, ‘अरे मूर्खों, ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, अब अमृत पिलाने से क्या फायदा?’। जब मैंने जीवन भर किसी की प्यास नहीं बुझाई, तो अब यह अमृत मेरे किस काम का? मेरा अंतःकरण अशांत है, क्योंकि मेरे कर्म शुद्ध नहीं रहे।’ धर्मपाल ने पश्चाताप से अपनी आँखें मूंद लीं। उसकी मृत्यु हुई, लेकिन उसके जीवन की कहानी पूरे नगर में एक शिक्षा बन गई। वहीं दूसरी ओर, दयाराम ने अपने साधारण जीवन में भी आत्मिक शांति और संतोष पाया। उसकी मृत्यु के बाद भी लोग उसे उसकी निस्वार्थ सेवा और दयालुता के लिए याद करते रहे। यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में किए गए कर्मों का फल अवश्य मिलता है। निस्वार्थ सेवा ही सच्ची भक्ति है और यही जीवन का सार है।

भजन का आध्यात्मिक महत्व और जीवन दर्शन

यह भजन और धर्मपाल की कथा मात्र कहानियाँ नहीं, बल्कि सनातन धर्म के गहन सिद्धांतों का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। ये हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पाठ सिखाते हैं:

* कर्म का सिद्धांत हिंदू धर्म में: ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ यह भगवद्गीता का अमर उपदेश है, जो बताता है कि हमारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर नहीं। धर्मपाल ने अपने कर्मों द्वारा अपने लिए दुख का बीज बोया, जबकि दयाराम ने निस्वार्थ सेवा से सुख और शांति प्राप्त की। हिंदू धर्म में कर्म को तीन प्रकार का माना गया है: संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। हमारे वर्तमान कर्म (क्रियमाण) ही हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। इसलिए, हमें सदैव सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहना चाहिए। यह कर्मों का हिसाब ही है, जो हमें मोक्ष की प्राप्ति या जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझाए रखता है।

* सेवा का महत्व: सनातन संस्कृति में ‘सेवा परमो धर्म:’ का विधान है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है: ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।’ यानी दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई पाप नहीं। प्यासे को पानी पिलाना, भूखे को भोजन कराना, असहाय की सहायता करना – ये सब सेवा के ही विभिन्न रूप हैं। यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और आत्मिक उदारता का प्रतीक है। जब हम निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं, तो हम वास्तव में ईश्वर की सेवा करते हैं, क्योंकि ईश्वर हर जीव में विद्यमान हैं।

* भक्ति में अच्छे कर्म: सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में धूप-दीपक जलाने या आरती करने तक सीमित नहीं है। भगवान स्वयं कहते हैं कि वे उन हृदयों में वास करते हैं, जो दूसरों के प्रति करुणा और दया रखते हैं। ‘भक्ति में अच्छे कर्म’ का अर्थ है अपनी भक्ति को सेवा के माध्यम से अभिव्यक्त करना। जब हम किसी दुखी व्यक्ति की सहायता करते हैं, तो हम वास्तव में ईश्वर की सेवा करते हैं, क्योंकि ईश्वर हर जीव में विद्यमान हैं। निस्वार्थ सेवा हमें अहंकार से मुक्त करती है और हमें ईश्वर के करीब लाती है। यह हमें यह समझने में मदद करती है कि ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अर्थ केवल स्वयं की नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि की सेवा है।

* जीवन दर्शन भजन: यह भजन हमें जीवन का एक सीधा-सादा, पर गहरा दर्शन सिखाता है। यह हमें चेतावनी देता है कि समय रहते सत्कर्म कर लो, क्योंकि एक बार अवसर चूक गया तो बाद में पछतावे का कोई अर्थ नहीं। जिस प्रकार प्यास लगने पर पानी न मिले और बाद में अमृत भी व्यर्थ लगे, उसी प्रकार जीवन में जब सेवा और करुणा का अवसर मिले, तो उसे व्यर्थ न जाने दें। यह भजन हमें भूतकाल के पछतावे से मुक्त होकर वर्तमान में जीने और सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक सुख भोग में नहीं, बल्कि त्याग और सेवा में है।

* Selflessness in Hinduism (निस्वार्थता): निस्वार्थता हिंदू धर्म का एक केंद्रीय स्तंभ है। इसका अर्थ है बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करना। जब हम निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं, तो हमें अहंकार से मुक्ति मिलती है और हम ब्रह्म के करीब आते हैं। यह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘तत् त्वम् असि’ के दर्शन को समझने में सहायक है, जहाँ हम स्वयं को और दूसरों को एक ही परम सत्ता का अंश मानते हैं। यह निस्वार्थता ही हमें सच्चे आनंद और आत्मज्ञान की ओर ले जाती है, जो अंततः मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

सेवा से जुड़ी सनातन परंपराएं और अनुष्ठान

सनातन धर्म में सेवा के कई रूप सदियों से परंपरा और रीति-रिवाजों का हिस्सा रहे हैं, जो इस भजन के संदेश को पुष्ट करते हैं:

* जल सेवा और अन्नदान: भारत के कई मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर गर्मियों में प्याऊ लगाए जाते हैं, जहाँ लोग निःशुल्क जल सेवा प्रदान करते हैं। भंडारे और लंगर लगाना, विशेषकर त्यौहारों और पर्वों पर, अन्नदान की प्राचीन परंपरा का ही हिस्सा है। यह दर्शाता है कि सेवा कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की जड़ें इसमें गहरी जमी हुई हैं। धार्मिक कथाओं में भी ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं जहाँ दान-पुण्य से भक्तों को अलौकिक फल प्राप्त हुए।

* गो सेवा और वृक्षारोपण: गाय को माता का दर्जा दिया गया है, और उसकी सेवा को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसी प्रकार, वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण भी सेवा का एक महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि यह संपूर्ण प्रकृति और जीवों के कल्याण से जुड़ा है। यह हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का बोध कराता है।

* तीर्थयात्रा और दान: भले ही तीर्थयात्रा एक धार्मिक कृत्य है, परंतु कई तीर्थयात्री इस दौरान भी दान-पुण्य और सेवा कार्यों में संलग्न रहते हैं। यह सिद्ध करता है कि हमारी परंपराएँ केवल कर्मकांडी नहीं, बल्कि सेवा और परोपकार को प्राथमिकता देती हैं। मंदिरों में होने वाली आरती के बाद भी प्रसाद वितरण और भण्डारा सेवा का ही एक रूप है।

इन सभी परंपराओं और अनुष्ठानों का मूल उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने अंदर दया, करुणा और परोपकार की भावना को जागृत करे और उसे अपने जीवन का अविभाज्य अंग बनाए। ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ भजन हमें इन रिवाजों के पीछे के वास्तविक भाव को समझने की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष: सत्कर्म ही सच्ची भक्ति का मार्ग है

संक्षेप में, ‘कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं’ भजन हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य से अवगत कराता है – कर्मों की शक्ति और निस्वार्थ सेवा का महत्व। यह हमें सिखाता है कि जीवन में अर्जित धन, पद या प्रतिष्ठा अंततः निरर्थक हैं, यदि हमने उनका उपयोग दूसरों की भलाई के लिए नहीं किया। हमें इस भजन के माध्यम से यह प्रेरणा मिलती है कि हम आज और अभी से सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त हों, हर उस व्यक्ति की सहायता करें जिसे हमारी आवश्यकता है, और हर उस प्राणी के प्रति दया का भाव रखें जो हमसे जुड़ा है।

यह भजन हमें अपने आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए एक स्पष्ट दिशा देता है। सच्ची भक्ति केवल ईश्वर की स्तुति में नहीं, बल्कि मानव सेवा में, जीव सेवा में निहित है। जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करते हैं, तब हमें वास्तविक आत्मिक शांति और आनंद की अनुभूति होती है, जो किसी भी भौतिक सुख से परे है। आइए, ‘सनातन स्वर’ के माध्यम से हम सभी इस पवित्र संदेश को अपने जीवन में उतारें और प्रत्येक दिन को सत्कर्मों और सेवा का पर्व बनाएँ, ताकि जब जीवन का अंतिम क्षण आए, तो हमें कोई पछतावा न हो, बल्कि संतोष और शांति की प्राप्ति हो। यही इस जीवन दर्शन भजन का अंतिम लक्ष्य है – आत्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर अग्रसर होना।

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