ऐसी भोले की रे चढ़ी है बरात: शिव विवाह भजन और इसका गहन महत्व

ऐसी भोले की रे चढ़ी है बरात: शिव विवाह भजन और इसका गहन महत्व

ऐसी भोले की रे चढ़ी है बरात: शिव विवाह भजन और इसका गहन महत्व

प्रस्तावना

शिव विवाह… यह केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे अद्भुत और विलक्षण विवाह का उत्सव है। जब भी हम ‘ऐसी भोले की रे चढ़ी है बरात’ जैसे भजन सुनते हैं, मन श्रद्धा और उल्लास से भर उठता है। यह वह अद्वितीय क्षण था जब औघड़दानी, श्मशान निवासी शिव, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए बारात लेकर निकले थे। यह कथा मात्र एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, समर्पण और जीवन के गूढ़ रहस्यों का प्रतीक है। आइए, इस दिव्य लीला में गोता लगाएँ और जानें इस महाकल्याणकारी विवाह की महिमा और इससे जुड़ी ‘जय शिव ओंकारा आरती’ के गहन अर्थ को। सनातन धर्म के इस पावन पर्व का आध्यात्मिक महत्व हमें किस प्रकार जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराता है, यह समझना हर शिव भक्त के लिए आवश्यक है।

शिव विवाह की अद्भुत कथा

कैलाश पर्वत पर विराजित देवों के देव महादेव, जो स्वयं वैराग्य और अनासक्ति के प्रतीक थे, उन्होंने जब देवी पार्वती के अटूट प्रेम, घोर तपस्या और समर्पण को स्वीकार किया, तब तीनों लोकों में आनंद की लहर दौड़ गई। माता सती के आत्मदाह के बाद, जब शिव शोक में लीन थे, तब पार्वती ने ही अपनी अटूट भक्ति और वर्षों की कठोर तपस्या से उनके हृदय में पुनः प्रेम की ज्योत जगाई। उन्होंने निराहार रहकर, पंच अग्नि तप करके और अनेक कष्ट सहकर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प लिया था। कामदेव को भस्म करने के बाद, पार्वती की निष्ठा और तपस्या ने शिव को इतना प्रसन्न किया कि वे उनसे विवाह करने को राजी हो गए, मानो ब्रह्मांड की सभी शक्तियां एक बिंदु पर आकर मिल रही हों और सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित हो रहा हो।

फिर आया वह पावन अवसर, जब कैलाश से शिव की बारात निकली। कल्पना कीजिए उस अविश्वसनीय दृश्य की, जब स्वयं शिव दूल्हे के रूप में तैयार हुए। उनके लिए कोई राजसी पोशाक नहीं थी, न कोई सोने-चांदी का चमकता श्रृंगार, और न ही कोई भव्य आभूषण। उनके दिगंबर स्वरूप पर भस्म का लेप था, जो उनकी वैराग्य भावना और श्मशानवासी रूप का प्रतीक था। गले में सर्पों की माला उनकी भयमुक्तता और काल पर विजय को दर्शाती थी, जटाओं में गंगा और माथे पर चंद्रमा उनके तीनों लोकों के स्वामी होने का प्रमाण थे। उनके वाहन नंदीराज, जो स्वयं एक बैल थे और शिव के परम भक्त भी, उस पर सवार होकर वे त्रिपुंड धारी महादेव चले, उनके पीछे एक ऐसी बारात थी जिसकी कल्पना कोई सामान्य व्यक्ति कर ही नहीं सकता।

शिव की बारात कोई साधारण बारात नहीं थी, जिसमें केवल देवता या मानव शामिल होते। इसमें देवताओं के साथ-साथ भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनियां, योगिनियां, तंत्र-मंत्र के साधक और शिव के विचित्र गणों का विशाल समूह शामिल था। कोई नाचता-गाता था, कोई भयानक ध्वनि करता था, कोई अपने शरीर पर चिता भस्म लगाए था, तो कोई हड्डियों की माला पहने। किसी के हाथ में त्रिशूल था तो किसी के हाथ में डमरू। नंदी के साथ-साथ सिंह, हाथी, बाघ जैसे पशु भी इस विचित्र बारात का हिस्सा थे, जो अपनी स्वाभाविक शत्रुता भूलकर एक साथ चल रहे थे, मानो समस्त प्रकृति एक अद्भुत सामंजस्य में बंध गई हो। यह दृश्य इतना अद्भुत और अवर्णनीय था कि इसे देखकर स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोक चकित रह गए, मानो स्वयं प्रकृति ने अपने सभी बंधनों को तोड़कर इस उत्सव में भाग लिया हो, और सृष्टि के नियम भंग हो गए हों।

जब यह अद्भुत बारात राजा हिमाचल के द्वार पहुंची, जहां विवाह की भव्य तैयारियां चल रही थीं और समस्त देवतागण व ऋषि-मुनि पार्वती की प्रतीक्षा में एकत्रित थे, तो एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। राजा हिमाचल और रानी मैना (मेनका), जो अपनी पुत्री पार्वती के विवाह को लेकर अत्यंत प्रसन्न थीं और उन्होंने शिव के सौम्य, सुंदर रूप की कल्पना कर रखी थी, उन्होंने जब इस भयानक बारात और स्वयं शिव के इस रौद्र, औघड़दानी रूप को देखा, तो वे भयभीत और चिंतित हो उठे। रानी मैना तो शिव के इस रूप को देखकर अत्यधिक व्याकुल हो गईं और बेहोश होने लगीं। उन्होंने सोचा कि यह कैसा दूल्हा है, जिसके साथ भूत-प्रेत और अजीबोगरीब जीव हैं, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए अशुभ माने जाते हैं। उन्होंने पार्वती से साफ कह दिया कि वे अपनी पुत्री को ऐसे दूल्हे के साथ विदा नहीं करेंगी, और विवाह से इंकार करने लगीं।

तब देवताओं ने, नारद मुनि ने और स्वयं पार्वती ने रानी मैना को समझाया। पार्वती ने अपनी माता से आग्रह किया कि वे शिव के वास्तविक स्वरूप को देखें, उनके भीतर छिपे कल्याणकारी, सुंदर, सौम्य और प्रेममय रूप को पहचानें। पार्वती के दृढ़ विश्वास और अनुरोध पर, शिव ने अपना वह मनमोहक, अत्यंत सुंदर और सौम्य रूप प्रकट किया, जिसे देखकर तीनों लोकों में शांति छा गई। उनका वह रूप इतना दिव्य और आकर्षक था कि हर कोई मोहित हो गया, समस्त वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो गया और हर कण में दिव्य सौंदर्य बिखर गया। तब कहीं जाकर राजा हिमाचल और रानी मैना को संतोष हुआ और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री पार्वती का हाथ जगत्पिता शिव के हाथ में सौंपा, और इस प्रकार ब्रह्मांड का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण विवाह संपन्न हुआ। यह कथा शिव पुराण में विस्तार से वर्णित है और भक्तों को सदैव प्रेरणा देती है।

यह विवाह केवल एक दैवीय मिलन नहीं था, बल्कि यह विरोधाभासों का संगम था। वैरागी का गृहस्थ बनना, सौंदर्य का वैराग्य से मिलना, शांत का तांडव से जुड़ना। इस विवाह के माध्यम से शिव ने सिद्ध किया कि वे हर रूप में स्वीकार्य हैं, वे सृष्टि के कण-कण में समाए हैं, और वे ही सत्य, सुंदर और कल्याणकारी हैं। यह विवाह दर्शाता है कि प्रेम और भक्ति की शक्ति से कोई भी बाधा पार की जा सकती है, और ईश्वर का प्रेम सबसे परे है। यह गृहस्थ जीवन की पवित्रता और वैराग्य के उच्चतम आदर्शों का समन्वय है, जहाँ शिव ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर सभी को कर्तव्यनिष्ठा और पारिवारिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया।

दिव्य महत्व और जय शिव ओंकारा आरती

शिव विवाह की यह कथा मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सिद्धांतों का प्रतीक है। यह विवाह हमें त्याग, तपस्या, प्रेम और समर्पण का मार्ग दिखाता है। शिव और पार्वती का मिलन पुरुष और प्रकृति का, शिव और शक्ति का शाश्वत योग है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता भी आवश्यक है। शिव का वैरागी रूप हमें अनासक्ति सिखाता है, जबकि उनका गृहस्थ रूप हमें कर्तव्यों और संबंधों के महत्व का बोध कराता है। यह विवाह हमें यह भी बताता है कि संसार में विपरीत दिखने वाली चीजें भी एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं, जैसे शिव का डरावना रूप भी अंततः कल्याणकारी ही होता है। शिव ने अपने इस विवाह से समाज को अनेक गूढ़ संदेश दिए, जिन्हें आत्मसात कर मनुष्य अपना जीवन सफल बना सकता है।

इस दिव्य शिव विवाह कथा का स्मरण करने के बाद, जब हम श्रद्धापूर्वक “जय शिव ओंकारा आरती” का गान करते हैं, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ‘जय शिव ओंकारा’ केवल एक आरती नहीं, यह शिव की सर्वव्यापकता, उनके निराकार स्वरूप और उनके ओंकार रूप की वंदना है। यह आरती हमें शिव के तीनों रूपों – ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता), और रुद्र (संहारक) – का स्मरण कराती है, क्योंकि शिव ही ओंकार हैं और ओंकार ही सृष्टि का मूल है, ध्वनि का आदि स्रोत है। इस आरती के माध्यम से हम उस परम सत्ता को नमन करते हैं जिसने सृष्टि का चक्र चलाया है और जो हर कण में विराजमान है। यह आरती भगवान शिव की आरती का अर्थ समझाती है और उनके विराट स्वरूप से हमारा परिचय कराती है।

शिव आरती का प्रत्येक छंद शिव के गुणों, उनकी महिमा और उनकी कृपा का बखान करता है। यह हमें उनके नीलकंठ स्वरूप, उनके त्रिनेत्र, उनके चंद्रमौलि और उनके भस्म धारी रूप की याद दिलाता है। यह हमें उनके कल्याणकारी स्वभाव और भक्तों पर उनके असीम प्रेम की अनुभूति कराता है। जब हम ‘जय शिव ओंकारा’ गाते हैं, तो हम शिव विवाह के माध्यम से स्थापित प्रेम और शक्ति के संगम को याद करते हैं, और उनसे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अंततः मोक्ष की कामना करते हैं। यह आरती हमें पापों से मुक्ति दिलाकर मन को पवित्र करती है और हमें शिवत्व की ओर अग्रसर करती है। शिव आरती का नियमित पाठ भक्तों को शिव के करीब लाता है, उन्हें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है और उन्हें भयमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह भगवान शिव की आरती का महत्व बताता है और क्यों यह हर पूजा का अभिन्न अंग है।

शिव विवाह से जुड़ी परंपराएं और अनुष्ठान

शिव विवाह का उत्सव पूरे भारत में बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, विशेषकर महाशिवरात्रि के पर्व पर, जिसे शिव और पार्वती के विवाह की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन न केवल वैवाहिक सुख की कामना करने वालों के लिए, बल्कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले भक्तों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन भक्तजन उपवास रखते हैं, भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिरों में शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है, जिससे समस्त वातावरण शुद्ध और पावन हो जाता है। बेलपत्र, धतूरा, भांग, चंदन, पुष्प और फल जैसी शिव को प्रिय वस्तुएं अर्पित की जाती हैं, जो उनकी सरलता और वैराग्य को दर्शाती हैं।

कई स्थानों पर, खासकर उत्तर भारत में, शिव बारात निकाली जाती है, जिसमें भक्त भगवान शिव के गणों का वेश धारण कर नाचते-गाते हुए चलते हैं। यह बारात शिव विवाह के विचित्र और अद्भुत दृश्य को जीवंत कर देती है, जहाँ भक्त स्वयं को उस दिव्य लीला का हिस्सा मानते हैं और अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं। शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में वर्णित शिव विवाह की कथा का पाठ किया जाता है, जिससे भक्तों को कथा के गहन अर्थ और शिक्षाओं को समझने का अवसर मिलता है। इस दिन रात भर जागकर शिव भजन और कीर्तन किए जाते हैं, जिसमें शिव महिमा का गुणगान होता है और ‘जय शिव ओंकारा’ जैसी आरतियाँ गाई जाती हैं। यह आरती प्रत्येक शिव पूजा का एक अनिवार्य अंग है, जो पूजा को पूर्णता प्रदान करती है। घरों में और मंदिरों में भगवान शिव की महिमा का बखान करने वाली यह आरती संध्या और प्रातःकाल में विशेष रूप से की जाती है। शिव विवाह के दिन, यह आरती भक्तों को उस दिव्य मिलन की स्मृति दिलाती है और उन्हें आनंद विभोर कर देती है, मानो वे स्वयं उस पावन अवसर के साक्षी बन रहे हों।

निष्कर्ष

“ऐसी भोले की रे चढ़ी है बरात” भजन हमें उस दिव्य, अलौकिक विवाह की याद दिलाता है जो केवल शिव ही कर सकते थे। यह विवाह हमें सिखाता है कि प्रेम किसी रूप, रंग या पहचान का मोहताज नहीं होता, बल्कि यह हृदय की पवित्रता और आत्मा के समर्पण पर आधारित होता है। यह दर्शाता है कि त्याग, तपस्या और समर्पण से हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। शिव और पार्वती का मिलन हमें जीवन के हर पहलू में संतुलन और सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है, और यह दिखाता है कि कैसे वैराग्य और गृहस्थ धर्म का अद्भुत संगम हो सकता है।

जब हम इस मंगलकारी विवाह का स्मरण करते हुए ‘जय शिव ओंकारा’ आरती गाते हैं, तो हम न केवल भगवान शिव की स्तुति करते हैं, बल्कि उनके सर्वव्यापी स्वरूप को भी हृदय में धारण करते हैं। यह आरती हमें उनके कल्याणकारी रूप से जोड़ती है और जीवन में शांति व समृद्धि प्रदान करती है। शिव विवाह की यह पावन कथा और शिव आरती का गान हमारे मन और आत्मा को शुद्ध करता है, हमें सांसारिक मोहमाया से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर करता है। आइए, हम भी इस अद्भुत प्रेम कहानी का स्मरण करें और शिव-पार्वती के आशीर्वाद से अपने जीवन को धन्य करें। हर-हर महादेव!

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