आरती: हमारी भक्ति का अटूट अंग और उसका गहरा महत्व

आरती: हमारी भक्ति का अटूट अंग और उसका गहरा महत्व

## आरती: हमारी भक्ति का अटूट अंग और उसका गहरा महत्व

भारत की सनातन संस्कृति में पूजा और आराधना का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इन सभी धार्मिक अनुष्ठानों में एक क्रिया ऐसी है जो लगभग हर पूजा के अंत में की जाती है – वह है ‘आरती’। क्या आपने कभी सोचा है कि यह सिर्फ एक रस्म है या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक, वैज्ञानिक या सांस्कृतिक अर्थ छिपा है?

आरती केवल अग्नि के समक्ष खड़े होकर गायन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति हमारी असीम श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक है। यह हमें न केवल अपने आराध्य से जोड़ती है, बल्कि हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा और शांति का संचार भी करती है।

### आरती का शाब्दिक अर्थ और उद्भव

‘आरती’ शब्द संस्कृत के ‘आर्ति’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘अत्यंत पीड़ा’ या ‘पीड़ा को हरने वाला’। जब हम पूरी श्रद्धा और भाव से आरती करते हैं, तो हम अपनी सभी कठिनाइयों और दुखों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देते हैं, और उनसे इन पीड़ाओं को हरने की प्रार्थना करते हैं। यह भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उन्हें सम्मान देने का एक तरीका है।

### आरती का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

आरती के दौरान हम पंचतत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश) का प्रयोग करते हैं, जो इसे एक समग्र और शक्तिशाली अनुष्ठान बनाते हैं:

1. **अग्नि (दीपक):** आरती का मुख्य तत्व दीपक की लौ है। अग्नि शुद्धता और प्रकाश का प्रतीक है। दीपक का प्रकाश अज्ञानता के अंधकार को दूर करके ज्ञान और चेतना का मार्ग प्रशस्त करता है। यह हमें सिखाता है कि जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन को दूसरों के कल्याण में लगाना चाहिए।

2. **वायु (धूप और कपूर):** आरती में जलाई जाने वाली धूप और कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध करती है। कपूर का जलना इस बात का प्रतीक है कि हमारा अहंकार और नकारात्मकता भी कपूर की तरह जलकर भस्म हो जाए, और हम शुद्ध मन से ईश्वर में लीन हो जाएँ। इसकी सुगंध मन को शांत करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।

3. **जल (शंख का जल या आरती के बाद छिड़का जाने वाला जल):** आरती के बाद जल का छिड़काव पवित्रता और शीतलता का प्रतीक है। यह हमें यह याद दिलाता है कि हमें जीवन में विनम्र और शांत रहना चाहिए।

4. **पृथ्वी (फूल):** आरती में फूलों का प्रयोग पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। फूल अपनी सुंदरता और सुगंध से वातावरण को खुशनुमा बनाते हैं। यह हमें अपनी विनम्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण को व्यक्त करने का अवसर देते हैं।

5. **आकाश (अनंत):** आरती करते समय हम अपनी दृष्टि को दीपक की लौ पर केंद्रित करते हैं और फिर उसे ईश्वर के दिव्य रूप पर ले जाते हैं। यह हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और उनका अस्तित्व अनंत व असीम है।

### आरती करने की सही विधि और भाव

आरती करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:

* **घड़ी की दिशा में घुमाना:** आरती की थाली को हमेशा घड़ी की दिशा में घुमाना चाहिए, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का चक्र बनता है।
* **मन की एकाग्रता:** आरती करते समय मन को पूरी तरह से ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दें। शब्दों को समझें और भाव के साथ गाएँ।
* **प्रकाश ग्रहण करना:** आरती पूरी होने के बाद, हम अपने हाथों को दीपक की लौ के ऊपर घुमाकर अपनी आँखों से लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से दीपक की पवित्र ऊर्जा हमारी आँखों और शरीर में प्रवेश करती है, जिससे मन और आत्मा को शांति मिलती है।

### निष्कर्ष

आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति का एक अनमोल हिस्सा है जो हमें अपने आराध्य से जुड़ने, मन को शुद्ध करने और सकारात्मकता से भरने का अवसर प्रदान करती है। यह हमें सिखाती है कि कैसे हम अपने जीवन में प्रकाश, पवित्रता और प्रेम को अपनाकर एक संतुलित और आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं। अगली बार जब आप आरती करें, तो उसके गहरे अर्थ को समझें और पूरी श्रद्धा के साथ इस दिव्य अनुभव में खो जाएँ। यही सच्ची भक्ति है।

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