आरती क्यों और कैसे करें? सनातन धर्म में आरती का महत्व और सही विधि

आरती क्यों और कैसे करें? सनातन धर्म में आरती का महत्व और सही विधि

आरती: दिव्य प्रकाश की आराधना और भक्ति का सार

सनातन धर्म में पूजा-अर्चना का एक अभिन्न अंग है ‘आरती’। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति हमारे प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता को व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम है। आरती का शाब्दिक अर्थ ‘आ+रात्रि’ से लिया गया है, जिसका तात्पर्य रात के अंत और नए प्रकाश के आगमन से है। यह अंधकार को मिटाकर प्रकाश, ज्ञान और सकारात्मकता की ओर बढ़ने का प्रतीक है। आइए, जानते हैं सनातन धर्म में आरती के महत्व और इसे करने के सही विधान के बारे में।

आरती क्या है और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है?

आरती मूलतः पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) के माध्यम से ईश्वर की स्तुति है। आरती की थाली में दीपक (अग्नि), जल से भरा शंख या लोटा (जल), फूल (पृथ्वी), धूप-अगरबत्ती (वायु) और घंटी की ध्वनि (आकाश) इन पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है। इन सभी तत्वों के माध्यम से हम संपूर्ण सृष्टि को ईश्वर को समर्पित करते हैं।

  • समर्पण का भाव: आरती करते समय हम अपने मन, वचन और कर्म से ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखते हैं। यह हमें अहंकार से मुक्त कर विनम्रता सिखाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: दीपक की लौ, धूप की सुगंध और मंत्रों के साथ बजने वाली घंटी की ध्वनि मिलकर एक दिव्य वातावरण बनाती है, जो मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।
  • अंधकार से प्रकाश की ओर: आरती का मुख्य उद्देश्य दीये की रोशनी के माध्यम से अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना है। यह हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

आरती करने का सही विधान (विधि)

आरती करने का एक निश्चित विधान होता है, जिसका पालन करने से इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  1. स्वच्छता और पवित्रता: आरती करने से पहले शरीर और मन की शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. आरती की थाली तैयार करना: एक थाली में विषम संख्या में दीपक (जैसे 1, 3, 5 या 7) प्रज्वलित करें। इन दीपकों में घी या तेल और रुई की बत्ती हो। साथ ही, कपूर, कुछ फूल, अक्षत (चावल), धूप या अगरबत्ती, एक छोटा शंख या लोटे में जल और घंटी रखें।
  3. सही क्रम में आरती करना: सर्वप्रथम, देवता के चरणों की चार बार आरती करें, फिर नाभि की दो बार, मुख की एक बार और अंत में पूरे शरीर की सात बार आरती करें।
  4. घंटी और तालबद्धता: आरती करते समय घंटी बजाई जाती है, जिससे वातावरण शुद्ध होता है और मन एकाग्र होता है। आरती के भजन या मंत्रों के साथ तालबद्ध तरीके से घंटी बजाएं।
  5. परिक्रमा और प्रसाद: आरती के बाद थाली को सभी उपस्थित लोगों को घुमाकर दर्शन कराएं ताकि वे लौ पर हाथ फेरकर अपने माथे पर लगा सकें। यह दिव्य ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रतीक है। तत्पश्चात, आरती की परिक्रमा करें और प्रसाद वितरित करें।

आरती के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक लाभ

आरती का केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक महत्व भी है:

  • वायुमंडल का शुद्धिकरण: दीपक और कपूर के जलने से तथा धूप-अगरबत्ती के धुएँ से वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणु नष्ट होते हैं, जिससे वायु शुद्ध होती है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: आरती के समय एकाग्रता से दीये की लौ को देखने और मंत्रों को सुनने से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव मुक्ति: आरती के दौरान उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा और शांतिपूर्ण वातावरण तनाव को कम करने और मानसिक शांति प्रदान करने में सहायक होता है।

निष्कर्ष: आरती – भक्ति का प्रकाश स्तंभ

आरती सनातन धर्म की एक सुंदर परंपरा है जो हमें ईश्वर से जुड़ने, कृतज्ञता व्यक्त करने और सकारात्मकता से भरने का अवसर देती है। यह केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और विश्वास का एक गहरा अनुभव है। अपने दैनिक जीवन में आरती को स्थान देकर हम न केवल अपने घर को पवित्र करते हैं, बल्कि अपने मन और आत्मा को भी दिव्य प्रकाश से प्रकाशित करते हैं। आइए, इस पावन परंपरा को अपनाएं और भक्ति के इस अनुपम प्रकाश को अपने जीवन में प्रकाशित करें।

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