## आरती का महत्व: क्यों करते हैं हम यह दिव्य स्तुति?
**परिचय**
भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता में आरती का एक विशेष स्थान है। मंदिरों में, घरों में और किसी भी शुभ अवसर पर, आरती के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुंदर और शक्तिशाली माध्यम है। आरती करते समय जलने वाले दीयों की लौ, धूप की सुगंध और बजते घंटों की ध्वनि एक दिव्य वातावरण का निर्माण करती है, जो मन को शांति और आत्मा को ऊर्जा प्रदान करती है। आइए, इस प्राचीन और पवित्र प्रथा के गहरे अर्थ को समझें।
**आरती क्या है और इसका महत्व क्या है?**
‘आरती’ शब्द ‘आरार्तिक’ से बना है, जिसका मूल अर्थ है “रात के समय में किया जाने वाला प्रकाश”। हालांकि, आज यह दिन के किसी भी प्रहर में किया जा सकता है। आरती मुख्य रूप से दीयों, कपूर, धूप, पुष्प और जल से देवताओं की स्तुति और उनकी महिमा का गुणगान करने की एक विधि है। यह ईश्वर के पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में उपस्थिति को स्वीकार करने का एक तरीका है।
**आरती के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पहलू:**
1. **कृतज्ञता और समर्पण:** आरती भगवान के प्रति हमारी कृतज्ञता और पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। हम ईश्वर को यह दिखाते हैं कि हम उनके प्रकाश, उनकी ऊर्जा और उनकी कृपा के बिना कुछ भी नहीं हैं। यह हमें अपनी विनम्रता का स्मरण कराता है।
2. **पंचतत्वों का मेल:** आरती में पृथ्वी (फूल, फल), जल (पानी), अग्नि (दीपक, कपूर), वायु (धूप, पंखा) और आकाश (ध्वनि, घंटियां) – इन पांच तत्वों का समावेश होता है। यह दर्शाता है कि हम समस्त सृष्टि को ईश्वर को अर्पित कर रहे हैं, जो स्वयं इन तत्वों के निर्माता हैं।
3. **नकारात्मक ऊर्जा का नाश:** दीयों की लौ और कपूर की सुगंध वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सिद्ध है कि कुछ सुगंधित द्रव्य जीवाणुओं को नष्ट करने और वातावरण को शुद्ध करने में सहायक होते हैं।
4. **मन की एकाग्रता:** आरती के दौरान बजने वाले घंटे, शंख और मंत्रों का जाप मन को बाहरी विचारों से हटाकर ईश्वर पर केंद्रित करने में मदद करता है, जिससे ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। यह एक प्रकार की ध्वनि चिकित्सा (sound therapy) का भी कार्य करती है।
5. **ज्ञान का प्रकाश:** दीये की लौ अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे जीवन से अज्ञानता हटाकर ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करें और हमें सत्य की ओर ले जाएं।
**आरती करने की सही विधि**
आरती करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि इसका पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और यह एक शुद्ध आध्यात्मिक अनुभव बन सके:
1. **शुद्धि:** आरती करने से पहले स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध कर लें। हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन में किसी भी प्रकार का द्वेष या नकारात्मक विचार न रखें।
2. **सामग्री:** एक थाली में दीपक (सामान्यतः घी के, विषम संख्या में जैसे 1, 3, 5), कपूर, अगरबत्ती/धूपबत्ती, पुष्प, रोली, अक्षत, जल और एक छोटा घंटा रखें।
3. **भाव:** आरती सदैव पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से करनी चाहिए। मन में ईश्वर का नाम जपते हुए और उनकी महिमा का चिंतन करते हुए आरती करें। केवल औपचारिकता के लिए न करें।
4. **घुमाने की दिशा:** दीपक को घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) भगवान की प्रतिमा या चित्र के समक्ष धीरे-धीरे घुमाएं। सामान्यतः, आरती को चार बार चरणों पर, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर और फिर सभी अंगों पर सात बार घुमाने का विधान है।
5. **ध्वनि:** आरती करते समय घंटा बजाना चाहिए और यदि संभव हो तो सभी मिलकर आरती गाएं। सामूहिक आरती का अपना अलग ही महत्व और ऊर्जा होती है।
6. **पूर्णता:** आरती समाप्त होने के बाद, सभी को आरती की लौ पर हाथ फेरकर अपने माथे से लगाना चाहिए, ताकि ईश्वर की दिव्य ऊर्जा और आशीर्वाद प्राप्त हो सके। इसके बाद, प्रसाद वितरण करें और उपस्थित सभी लोगों में बांटें।
**निष्कर्ष**
आरती केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ जुड़ने का एक जीवंत माध्यम है। यह हमें विनम्रता, कृतज्ञता और प्रेम का पाठ सिखाती है। आरती करने से न केवल हमारे घर का वातावरण शुद्ध होता है, बल्कि हमारा मन भी शांत, सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। तो अगली बार जब आप आरती करें, तो इसके पीछे छिपे गहरे अर्थ और महत्व को समझें और इसे पूरे हृदय से अनुभव करें। यह दिव्य स्तुति हमें ईश्वर के और करीब लाएगी और हमारे जीवन को प्रकाशमय बनाएगी। भक्ति के इस अनुपम रूप को अपनाकर हम स्वयं को परमात्मा से जोड़ते हैं और आंतरिक शांति का अनुभव करते हैं।

